पिता नहीं थे, मां ने संभाली जिम्मेदारी; भोजपुर की बेटी ने गोल्ड मेडल के बाद BPSC में हासिल की सफलता
डुमरांव नगर परिषद की नगर प्रबंधक स्तुति सिन्हा ने पिता के निधन के बाद मां के संघर्ष और अपने दृढ़ ...और पढ़ें

डुमरांव नगर परिषद की प्रबंधक स्तुति सिन्हा।
HighLights
पिता के निधन के बाद मां ने संभाली जिम्मेदारी।
विश्वविद्यालय में गोल्ड मेडल जीता, बनीं टॉपर।
तीसरे प्रयास में बीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की।
अनिल कुमार ओझा, डुमरांव (बक्सर)। बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ गया। परिवार के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां थीं, लेकिन मां ने हार नहीं मानी।
बेटी के सपनों को पंख देने के लिए उन्होंने खुद संघर्ष किया। स्कूल में काम करते हुए परिवार संभाला और बेटी की पढ़ाई जारी रखी।
मां की मेहनत और बेटी के संकल्प ने ऐसी कहानी लिखी, जो आज न सिर्फ बेटियों, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में बच्चों के सपने पूरे करने वाले हर परिवार के लिए प्रेरणा है। यह कहानी है डुमरांव नगर परिषद की नगर प्रबंधक स्तुति सिन्हा की।
पिता के निधन के बाद मां ने संभाली जिम्मेदारी
पिता के निधन के बाद स्तुति की परवरिश और पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
स्कूल में काम करते हुए परिवार का खर्च चलाया और स्तुति को लगातार पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। मां के संघर्ष को करीब से देख रही स्तुति ने भी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने पढ़ाई को अपना हथियार बनाया और लक्ष्य की ओर बढ़ती रहीं।
पढ़ाई में भी कायम की पहचान
मूल रूप से भोजपुर की रहने वाली स्तुति ने लोक प्रशासन विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। विश्वविद्यालय में टॉप कर उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया।
यह सम्मान उन्हें बिहार के तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन के हाथों मिला। बेटी की इस उपलब्धि ने वर्षों से संघर्ष कर रही मां के चेहरे पर गर्व की चमक ला दी।
इसके बाद स्तुति ने प्रशासनिक सेवा में जाने का लक्ष्य तय किया। उन्होंने बीपीएससी की तैयारी शुरू की। सफलता के लिए उन्हें लगातार प्रयास करना पड़ा।
पहले और दूसरे प्रयास में सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। तीसरे प्रयास में बीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने अफसर बनने का अपना सपना पूरा किया।
वर्तमान में वह डुमरांव नगर परिषद में नगर प्रबंधक के रूप में जिम्मेदारी निभा रही हैं।
'मेरी सफलता के पीछे मां का संघर्ष'
अपने संघर्ष को याद करते हुए स्तुति सिन्हा कहती हैं, 'मेरी सफलता के पीछे मेरी मां का संघर्ष है। पिता के नहीं रहने के बाद मुझे पढ़ाने के लिए मां ने बहुत कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने कभी परिस्थितियों को मेरे सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया।'
वह कहती हैं कि बीपीएससी में तीसरे प्रयास में मिली सफलता उनके लिए बेहद खास थी। यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि मां के वर्षों के त्याग और संघर्ष का परिणाम थी। आज पद की जिम्मेदारी संभालते हुए भी उन्हें सबसे पहले मां की मेहनत याद आती है।
बेटियों के लिए स्तुति का संदेश
स्तुति छात्र-छात्राओं को संदेश देती हैं कि असफलता को मंजिल की रुकावट नहीं, बल्कि सीख के रूप में लेना चाहिए। लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो कठिन परिस्थितियां भी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं।
स्तुति की कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, मां का संकल्प और बेटी की मेहनत मिल जाए तो सपनों को हकीकत में बदला जा सकता है।
