अशोक सिंह, बक्सर। Rawan Vadh Unique Tradition: विजयादशमी के दिन रावण वध के आयोजन की परंपरा भारत के लगभग हर बड़े शहर और कई गांवों में भी है। लेकिन, इसके कई अपवाद भी हैं। कुछ जगहों पर रावण की पूजा भी होती है। बिहार का भी एक गांव ऐसा है, जहां रावण वध का आयोजन विजयादशमी के दिन नहीं होता है।

विजयादशमी के दिन नहीं होता रावध वध 

उत्‍तर प्रदेश के वाराणसी की तरफ से दाखिल होकर पटना आने के रास्‍ते में बिहार का बक्‍सर जिला पड़ता है। बक्‍सर के इटाढ़ी प्रखंड का एक गांव है कुकुढ़ा। यहां विजयादशमी के दिन रावण का वध नहीं होता है। बल्‍क‍ि विजयादशमी के पांच रोज गुजरने पर शरद पूर्णिमा के दिन यहां रावण वध का आयोजन किया जाता है। 

लंबे अरसे से चली आ रही अनोखी परंपरा

कुकुढा में विजयादशमी के पांच दिन बाद तक रावण जिंदा रहता है। दशहरा बीत जाने के पांच दिन बाद पूर्णिमा के दिन यहां पूरे धूमधाम के साथ रावण वध का आयोजन किया जाता है। गांव के बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि कुकुढ़ा में लंबे अरसे से यह परंपरा चली आ रही है, जिसका आज भी गांव के लोग चाहे जहां कहीं भी रहें, पालन करते चले आ रहे हैं।

परंपरा की वजह किसी को नहीं पता 

इस परंपरा के पीछे क्या कारण है यह किसी को जानकारी नहीं है। गांव की हर पीढ़ी अपने दादा परदादा के समय से परम्परा का पालन करते देखते आ रहे हैं, जिसका मौजूदा पीढ़ी भी अनुसरण करती चली आ रही है। परम्परा के अनुसार यहां शरद पूर्णिमा को ही भगवान राम बाण चलाते हैं और रावण का वध होता है। 

प्राथमिक विद्यालय के मैदान में होता आयोजन 

इसके लिए रामलीला समिति द्वारा गांव के अनुसूचित जाति प्राथमिक विद्यालय के मैदान में 35 फीट का रावण तैयार किया गया है। शरद पूर्णिमा की शाम गांव के बच्चे से लेकर बुजुर्ग नए नए वस्त्र पहनकर स्कूल मैदान में रावण वध कार्यक्रम मेला में शामिल होने और उत्सव का आनन्द लेने पहुंचते हैं।

बारिश ने बचा ली रावण की जान 

कुकुढ़ा के रहने वाले संजय सिंह बताते हैं कि शरद पूर्णिमा के एक दिन पहले गांव में पुतला बनाने की तैयारी शुरू होती है। कई बार ऐसा हुआ कि मौसम खराब होने के कारण रावण वध का कार्यक्रम टालना पड़ गया। एक बार तो ऐसा हुआ कि खराब मौसम के कारण रावण वध का कार्यक्रम टाल कर नई तारीख तय की गई, लेकिन उस दिन भी बारिश हो गई। 

Edited By: Shubh Narayan Pathak

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