जिउतिया व्रत की सही तारीख कौन-सी? बक्सर में विद्वानों के दो मत; समझें 3 और 4 अक्टूबर का पूरा गणित
बक्सर में जिउतिया व्रत की तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है, जिससे श्रद्धालुओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई ...और पढ़ें

जिउतिया व्रत की तारीख पर फिर असमंजस, बक्सर में 3 या 4 अक्टूबर को लेकर विद्वानों में मतभेद। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
बक्सर में जिउतिया व्रत की तिथि पर विद्वानों में मतभेद।
रामेश्वरनाथ मंदिर के विद्वानों ने 4 अक्टूबर को व्रत बताया।
डुमरांव के विद्वानों ने 3 अक्टूबर को व्रत करने का निर्णय लिया।
जागरण संवाददाता, बक्सर। शास्त्र में आश्विन कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि में जिउतिया, जीमूत वाहन अथवा जीवित्पुत्रिका व्रत करने का विधान है। इससे पहले का दिन नहाय-खाय और दूसरा दिन खरजितिया कहलाता है।
जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत की तिथि को लेकर जिले में अलग-अलग मत सामने आने से जनमानस में संशय की स्थिति बनी हुई है।
इस पर विद्वतजनों के भिन्न-भिन्न विचार हैं। बक्सर के रामेश्वरनाथ मंदिर परिसर में स्थानीय विद्वानों की बैठक में चार अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका व्रत तथा पांच अक्टूबर को पारण का निर्णय लिया गया है।
तीन अक्टूबर को उपवास और 4 को पारण!
वहीं, डुमरांव के जंगलीनाथ शिव मंदिर परिसर में हुई विद्वानों की बैठक में तीन अक्टूबर को व्रत और चार अक्टूबर की सुबह 7:28 बजे के बाद पारण करने पर सहमति बनी है।
रामेश्वरनाथ मंदिर में गत दिनों आहूत विद्वतजन की एक बैठक में डा. नारायण उपाध्याय, छविनाथ त्रिपाठी, आचार्य कृष्णानंद पौराणिक, पं. नरोत्तम द्विवेदी, संजय शास्त्री, पुरुषोत्तम शास्त्री, पं. आदित्याचार्य और पं. मनोज शास्त्री आदि के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत कथा भविष्योत्तर पुराण से ली गई है।
इसमें स्पष्ट है कि अश्विन कृष्ण सप्तमी से रहित शुभ अष्टमी तिथि को ब्रह्म भाव प्राप्त है। तीन को सप्तमी तिथि सुबह 9:54 बजे तक है, जो पूरी तरह सप्तमी से विद्ध है।
चार को उदयाष्टमी है और संपूर्ण नवमी है। लेकिन अगले दिन उदय नवमी नहीं है, इसलिए पारण हेतु भी उचित है। अर्थात नवमी तिथि की हानि है।
और दशमी तिथि में पारण का निषेध नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में सप्तमी रहित (के बिना) उदयाष्टमी में चार अक्टूबर, रविवार को जीवित्पुत्रिका व्रत करना श्रेयस्कर होगा।
दूसरी ओर, डुमरांव के जंगलीनाथ शिव मंदिर परिसर में क्षेत्र के विद्वान पंडितों की बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता प्रखंड विद्वान पंडित लक्ष्मण दुबे (लहरी) ने की, जबकि संचालन आचार्य पंडित विमलेश ओझा ने किया।
चार अक्टूबर के व्रत पर मतैक्य नहीं
इसमें विभिन्न शास्त्रों और प्रचलित पंचांगों का अध्ययन-मंथन किया गया। विद्वानों ने कहा कि लोगों के बीच अलग-अलग तिथि बताए जाने से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
बैठक में प्रचलित पंचांगों के आधार पर स्पष्ट किया गया कि तीन अक्टूबर, शनिवार को ही जीवित्पुत्रिका व्रत किया जाएगा तथा चार अक्टूबर, रविवार को सुबह 7:28 बजे के बाद पारण होगा।
बैठक में ऋषिकेश पंचांग, विश्व पंचांग, महावीर पंचांग, हनुमान पंचांग और आदित्य पंचांग समेत प्रचलित पंचांगों में 03 अक्टूबर को जिउतिया व्रत का उल्लेख होने की बात कही गई।
सर्वसम्मति से तीन अक्टूबर को व्रत करने तथा शाम प्रदोषकाल में अष्टमी तिथि के दौरान जीमूतवाहन का पूजन करने का निर्णय बताया गया।
दोनों मतों के कारण श्रद्धालुओं में असमंजस
जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथि को लेकर दो स्थानों पर हुई बैठकों में अलग-अलग निर्णय सामने आने से जनमानस में असमंजस बना हुआ है।
अधिवक्ता बिंदेश्वरी पांडेय, अधिवक्ता सुदर्शन वर्मा, अधिवक्ता अविनाश सिन्हा, शिक्षाविद राजेश कुमार, अभिकर्ता रजनीकांत पांडेय आदि का कहना है कि जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथि मतभेद का लगातार यह दूसरा साल है।
बीते वर्ष 2025 में भी जीवित्पुत्रिका व्रत 14 या 15 सितंबर को लेकर इसी प्रकार के मतभेद थे। लेकिन पंचांग तिथि को आधार मानते हुए भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने 14 सितंबर को जिउतिया व्रत का अनुपालन किया।
लोगों का कहना है कि स्थानीय विद्वत परिषदों को चाहिए कि वे सामूहिक रूप से उचित निर्णय लेकर दें, ताकि जनता भ्रमित न हो और इसका दुष्प्रभाव न पड़े।
