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बक्सर युद्ध ने बदली थी भारत की सत्ता की तस्वीर, कतकौली मैदान में आज भी मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

Published: Thu, 22 Oct 2026 07:00 AM (IST)

22 अक्टूबर 1764 को हुए बक्सर युद्ध ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक वर्चस्व का मार्ग प्रशस्त किया ...और पढ़ें

कथकौली गांव जाने का रास्ता और किनारे की ओर मजार। जागरण आर्काइव

कथकौली गांव जाने का रास्ता और किनारे की ओर मजार। जागरण आर्काइव

HighLights

  1. बक्सर युद्ध ने कंपनी के राजनीतिक वर्चस्व का मार्ग खोला।

  2. कतकौली में युद्ध के ऐतिहासिक शिलालेख, स्मारक मौजूद।

  3. धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव में चुनौतियां बनी हुई हैं।

जागरण संवाददाता, बक्सर। जिला मुख्यालय से सटे 22 अक्टूबर 1764 को हुई लड़ाई ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक वर्चस्व का रास्ता खोल दिया था।

मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना की हार के बाद कंपनी की ताकत सैन्य विजय से आगे बढ़कर राजस्व और शासन के अधिकार तक पहुंच गई।

इस ऐतिहासिक बदलाव के साक्षी के तौर पर कतकौली गांव के पास स्थित स्मारक परिसर में इस युद्ध की गाथा बताते ऐतिहासिक शिलालेख आज भी मौजूद हैं।

हालांकि, इन धरोहरों के संरक्षण और नई पीढ़ी तक युद्ध का इतिहास पहुंचाने के प्रयासों के सामने रखरखाव की चुनौती बनी हुई है।

प्लासी से आगे बढ़कर बक्सर ने मजबूत की कंपनी की सत्ता

1757 में प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल में प्रभाव बढ़ाने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी का मीर कासिम से टकराव उसके व्यापारिक विशेषाधिकारों को लेकर हुआ।

कंपनी के कर्मचारी दस्तक का इस्तेमाल निजी व्यापार में कर रहे थे, जिससे स्थानीय व्यापारियों को नुकसान और राजस्व की हानि हो रही थी।

मीर कासिम ने आंतरिक व्यापारिक कर समाप्त कर इस असमानता को दूर करने की कोशिश की, लेकिन संघर्ष बढ़ने पर उसे बंगाल छोड़ना पड़ा।

बक्‍सर का युद्ध: एक नजर में 

  • 22 अक्टूबर 1764 को हुआ था ऐतिहासिक युद्ध
  • 8,500 के आसपास सैनिक थे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में
  • 40,000 से 50,000 सैनिक थे संयुक्त भारतीय सेना में
  • 857 यूरोपीय सैनिक थे कंपनी की सेना में
  • 5,297 कंपनी की सेना में भारतीय सिपाहियों की संख्या
  • 847 मृत एवं घायल कंपनी की ओर से सैनिक
  • 2,000 सैनिक संयुक्त सेना की ओर से मृतक

इसके बाद उसने शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर कंपनी के विरुद्ध मोर्चा बनाया। मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व वाली कंपनी की सेना ने 22 अक्टूबर 1764 को कतकौली के मैदान में संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।

इस हार ने उत्तर भारत की राजनीतिक शक्ति-संरचना बदल दी। अगस्त 1765 में इलाहाबाद की संधियों के जरिए कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली।

इससे उसे इन क्षेत्रों में राजस्व वसूली का अधिकार प्राप्त हुआ और वह भारतीय संसाधनों के इस्तेमाल से अपना व्यापार तथा सैन्य विस्तार करने में सक्षम हुई।

कतकौली में मौजूद हैं युद्ध के ऐतिहासिक साक्ष्य

बक्सर शहर के निकट स्थित कतकौली मैदान में अंग्रेजों की विजय की स्मृति में निर्मित पत्थर का विजय स्तंभ आज भी मौजूद है। इस पर अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली और हिंदी में शिलालेख अंकित हैं।

मैदान के पूर्वी हिस्से में स्थित शहीदों का कुआं स्थानीय इतिहास में युद्ध में मारे गए सैनिकों की स्मृति से जुड़ा है। परिसर में शुजाउद्दौला के सैन्य कमांडरों सैयद अब्दुल कादिर और सैयद अब्दुल गुलाम की मजारें भी हैं।

पांच साल पहले मनरेगा से बना पार्क

वर्ष 2021 में मनरेगा के तहत 9 लाख 88 हजार 200 रुपये की लागत से मैदान में पार्क बनाया गया था। इसमें पौधारोपण और विजय स्तंभ की आंशिक मरम्मत कराई गई, लेकिन नियमित रखरखाव के अभाव में टाइलें उखड़ने, पौधों के सूखने और गंदगी जैसी समस्याएं सामने आईं।

पर्यटकों के लिए पेयजल, शौचालय, छांव और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी भी बताई गई है। हाल के समय में जिला प्रशासन ने कतकौली युद्ध मैदान, चौसा युद्ध मैदान और रामरेखा घाट का निरीक्षण कर विरासत संरक्षण से जुड़े निर्देश दिए हैं।

इनमें नियमित सफाई, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा बलों की तैनाती, ऐतिहासिक जानकारी वाले साइनेज बोर्ड लगाने, विजय स्तंभ और चतुर्भाषी शिलालेखों के रासायनिक संरक्षण तथा मैदान तक पहुंचने वाले मार्ग की मरम्मत की कार्ययोजना शामिल है।