भोजपुर सहित बिहार में छाई चुनार की मूर्तियों की धूम, आरा में 10 करोड़ के कारोबार का अनुमान
चुनार की मूर्तियां दीपावली और अन्य त्योहारों पर भोजपुर जिले सहित बिहार में काफी लोकप्रिय हो रही हैं। इनकी पारंपरिक ...और पढ़ें

भोजपुर सहित बिहार में छाई चुनार की मूर्तियों की धूम
HighLights
चुनार की मूर्तियां बिहार में त्योहारों पर लोकप्रिय।
भोजपुर में 10 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान।
लक्ष्मी-गणेश, हनुमान, कुबेर मूर्तियों की भारी मांग।
जागरण संवाददाता, आरा। दीपावली और अन्य धार्मिक अवसरों पर भोजपुर जिले सहित बिहार में उत्तर प्रदेश के चुनार की बनी मूर्तियों की खूब धूम है। लक्ष्मी-गणेश से लेकर हनुमान और कुबेर जी की आकर्षक प्रतिमाएं लोगों को खूब पसंद आ रही हैं।
जिले में चुनार की मूर्तियों का कारोबार करीब 10 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। दीपावली के अवसर पर बाजारों में इन मूर्तियों की मांग बढ़ गई है। घरों के पूजा स्थल से लेकर दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक के लिए लोग अपनी पसंद और जरूरत के अनुसार प्रतिमाओं की खरीदारी कर रहे हैं।

चुनार की मूर्तियों की खासियत उनकी पारंपरिक निर्माण शैली है। जनक मूर्ति कला मंदिर के जनक मौर्य व लक्ष्मी मूर्ति कला मंदिर चुनार के मिर्जापुर निवासी ने बताया कि मिट्टी में थोड़ी मात्रा चुनार का पत्थर में कंकर मिलाकर तैयार किए गए मिश्रण को कारीगर अपने हाथों से आकार देते हैं।
उन्होंने कहा कि यही वजह है कि इन प्रतिमाओं की बनावट और निर्माण प्रक्रिया दूसरी मूर्तियों से अलग मानी जाती है।

आरा शहर के आरण्य देवी स्थान स्थित जलपुरा स्टोर के थोक विक्रेता राहुल कुमार और रोहित कुमार ने बताया कि चुनार की मूर्तियों की अपनी अलग पहचान है। इनकी मांग भोजपुर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में रहती है। त्योहारों के समय खरीदारी बढ़ने से थोक बाजार में भी गतिविधियां तेज हो जाती हैं।
जिले के अलग-अलग हिस्सों से दुकानदार और ग्राहक यहां मूर्तियां खरीदने पहुंचते हैं। थोक बाजार से मूर्तियां खरीदकर खुदरा कारोबारी उन्हें स्थानीय बाजारों में उपलब्ध कराते हैं।

मिट्टी और कंकर के मिश्रण से तैयार होती हैं प्रतिमाएं
चुनार की मूर्तियों को बनाने की प्रक्रिया इन्हें खास बनाती है। कारीगर मिट्टी में थोड़ी मात्रा में कंकर मिलाकर मिश्रण तैयार करते हैं। इसके बाद मूर्ति के आकार और स्वरूप के अनुसार उसे गढ़ने का काम किया जाता है।
कारीगर अपने हाथों से प्रतिमाओं को आकार देते हैं और उनकी बनावट पर बारीकी से काम करते हैं। इस प्रक्रिया में अनुभव और कुशलता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
मान्यता और पारंपरिक विश्वास के कारण भी इन मूर्तियों की चर्चा होती है। स्थानीय स्तर पर कहा जाता है कि चुनार की मिट्टी में पत्थर या कंकर का मिश्रण होने से मूर्तियों को विशेष स्वरूप मिलता है।
हालांकि, अलग-अलग कारीगरों की निर्माण तकनीक में अंतर हो सकता है। कुछ मूर्तियां हाथों से तैयार की जाती हैं, जबकि दूसरी तरह की कई प्रतिमाएं सांचे में ढालकर बनाई जाती हैं।
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं की सबसे अधिक मांग
दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। इस कारण बाजार में इन दोनों देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की मांग सबसे अधिक रहती है।
घरों में पूजा के लिए छोटी और मध्यम आकार की मूर्तियां खरीदी जाती हैं। वहीं, दुकानदार और व्यवसायी अपने प्रतिष्ठानों में पूजा के लिए अपेक्षाकृत बड़ी प्रतिमाएं पसंद करते हैं।
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं में चेहरे की बनावट, आभूषणों की सजावट और प्रतिमा के समग्र स्वरूप पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
बाजार में ग्राहकों को उनकी पसंद के अनुरूप अलग-अलग आकार और डिजाइन की मूर्तियां मिल रही हैं। कुछ ग्राहक पारंपरिक स्वरूप वाली प्रतिमाएं पसंद करते हैं, तो कुछ सजावटी और आकर्षक बनावट वाली मूर्तियों की खरीदारी करते हैं।
हनुमान और कुबेर जी की प्रतिमाएं भी पसंद
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं के साथ हनुमान जी और कुबेर जी की मूर्तियों की भी मांग बनी हुई है। श्रद्धालु धार्मिक आस्था और पूजा-पाठ के उद्देश्य से इन प्रतिमाओं की खरीदारी करते हैं। अलग-अलग आकार में उपलब्ध मूर्तियों के कारण ग्राहकों को अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प मिल रहे हैं।
व्यापारियों के अनुसार, त्योहारों के दौरान ग्राहकों की पसंद और खरीदारी की जरूरत के हिसाब से विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं मंगाई जाती हैं।
थोक कारोबारियों के लिए समय पर मूर्तियों की उपलब्धता बनाए रखना भी जरूरी होता है, ताकि खुदरा दुकानदारों को मांग के अनुरूप सामान मिल सके। इससे जिले के विभिन्न बाजारों तक चुनार की मूर्तियां पहुंचती हैं।
चुनार के कारीगरों की कला को मिल रहा बाजार
चुनार की मूर्तियों की मांग केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके निर्माण से जुड़ी पारंपरिक कारीगरी भी इन्हें अलग पहचान देती है। मिट्टी और कंकर के मिश्रण को आकार देकर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करना कारीगरों के अनुभव और मेहनत का काम है।
मूर्तियों की बारीक बनावट और सजावट में उनकी कुशलता दिखाई देती है। भोजपुर जिले में करीब 10 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान इस बाजार के व्यापक स्वरूप को दर्शाता है।
त्योहारों के समय बढ़ने वाली मांग से थोक और खुदरा कारोबारियों को व्यापार का महत्वपूर्ण अवसर मिलता है। आरा के बाजारों में चुनार की मूर्तियों की उपलब्धता से ग्राहकों को पारंपरिक प्रतिमाएं खरीदने का विकल्प मिल रहा है।
धार्मिक आस्था, पारंपरिक कारीगरी और आकर्षक बनावट के मेल से चुनार की मूर्तियां भोजपुर के बाजार में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।
