‘सजन रे झूठ मत बोलो’ से ‘पिया तोसे नैना’ तक...; शैलेंद्र के अमर गीत आज भी क्यों हैं खास? आरा में जिंदा है विरासत
महान गीतकार शैलेंद्र की जयंती पर उनके अमर गीतों और जीवन-दर्शन को याद किया गया, जो आज भी प्रासंगिक हैं। ...और पढ़ें

फिल्म अभिनेता राजकपूर और गीतकार शैलेंद्र। सौ-इंटरनेट
HighLights
शैलेंद्र के गीत आज भी आम आदमी के जीवन से जुड़े हैं।
उनका जन्म रावलपिंडी में हुआ, पैतृक गांव आरा का अख्तियारपुर है।
अख्तियारपुर में शैलेंद्र की प्रतिमा और स्मृति स्थल की मांग।
शमशाद प्रेम, आरा। Shailendra Birth Anniversary:'सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी...', 'सजन रे झूठ मत बोलो...',' दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में...', 'पिया तोसे नैना लागे रे...'।
ये महज फिल्मी गीत नहीं हैं, बल्कि आम आदमी के सुख-दुख, संघर्ष, प्रेम, उम्मीद और जीवन-दर्शन की ऐसी अभिव्यक्तियां हैं, जो समय की सीमाओं को पार कर आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।
इन अमर गीतों के रचयिता थे शंकर दास केसरी लाल उर्फ शैलेंद्र। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के इस महान गीतकार को दुनिया छोड़े पांच दशक से अधिक समय बीत चुका है।
लेकिन उनकी कलम से निकले शब्द आज भी उतने ही जीवंत हैं। पुरानी पीढ़ी उन्हें सुनकर अपने दौर में लौट जाती है, तो नई पीढ़ी उनके गीतों में जिंदगी के ऐसे अर्थ तलाशती है, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
रावलपिंडी में जन्म, आरा के अख्तियारपुर से जुड़ा रिश्ता
शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। उनका जीवन आर्थिक संघर्षों के बीच बीता। परिवार की परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें रावलपिंडी छोड़कर मथुरा आना पड़ा।
यहीं उनकी पढ़ाई आगे बढ़ी और कविता के प्रति उनका अनुराग गहरा होता गया। पढ़ाई में भी वे बेहद मेधावी थे। वर्ष 1939 में उन्होंने मथुरा के राजकीय इंटर कालेज से पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान हासिल किया था।
हालांकि, आगे चलकर उनकी पहचान पढ़ाई से कहीं अधिक उनकी कविता और गीतों ने बनाई। शैलेंद्र का रिश्ता बिहार के आरा शहर से सटे अख्तियारपुर (बड़का गांव) से भी रहा है।
यही वह गांव है, जहां उनके पूर्वजों की जड़ें जुड़ी हैं। आज भी गांव में उनके परिवार और रिश्तेदारी से जुड़े लोग रहते हैं। इस गांव के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि देश के महान गीतकारों में शुमार शैलेंद्र की पारिवारिक विरासत यहां से जुड़ी रही।
राज कपूर ने पहचानी प्रतिभा, फिर बना इतिहास
रोजगार की तलाश में शैलेंद्र मुंबई पहुंचे थे। वहां एक कवि सम्मेलन में उनकी मुलाकात अभिनेता-निर्देशक राज कपूर से हुई। राज कपूर उनकी कविता और संवेदनशील लेखन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शैलेंद्र को फिल्मों के लिए लिखने का प्रस्ताव दिया।
शुरुआत में शैलेंद्र ने फिल्मों के लिए गीत लिखने से इनकार कर दिया। लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के चलते बाद में उन्होंने फिल्मी गीत लेखन स्वीकार कर लिया।
वर्ष 1949 में आई फिल्म बरसात से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। इस फिल्म के लिए उन्होंने 'बरसात में हमसे मिले तुम सजन...' और 'पतली कमर है...' जैसे गीत लिखे।
इसके बाद राज कपूर, संगीतकार शंकर-जयकिशन और शैलेंद्र की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को एक के बाद एक यादगार गीत दिए।
आवारा, श्री 420, चोरी-चोरी, जिस देश में गंगा बहती है और तीसरी कसम जैसी फिल्मों के गीतों ने शैलेंद्र को अमर कर दिया। उनके गीतों में प्रेम था तो सामाजिक सरोकार भी थे, मस्ती थी तो जिंदगी की कड़वी सच्चाइयां भी थीं।
सहज शब्दों में कह जाते थे जिंदगी की बड़ी बातें
शैलेंद्र की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा थी। वे कठिन और भारी-भरकम शब्दों के बजाय रोजमर्रा की सहज भाषा में ऐसी बातें कह जाते थे, जिन्हें सुनकर आम आदमी खुद को उन गीतों में तलाशने लगता था।
'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार...' मानवता और दूसरों के सुख में अपना सुख तलाशने का संदेश देता है। 'मेरा जूता है जापानी...' में साधारण शब्दों के जरिए आत्मविश्वास और भारतीयता की भावना सामने आती है।
इसी तरह 'सजन रे झूठ मत बोलो...' जीवन की नश्वरता और कर्म की सच्चाई की याद दिलाता है। 'तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर...' संघर्ष के बीच उम्मीद और हौसले की आवाज बन जाता है।
यही वजह है कि शैलेंद्र के गीत किसी खास दौर या पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे। उनकी रचनाओं में आम आदमी की जिंदगी दिखाई देती है।
‘तीसरी कसम’ बनी जीवन का सबसे संवेदनशील अध्याय
शैलेंद्र ने करीब 170 फिल्मों के लिए गीत लिखे। लेकिन फिल्म तीसरी कसम उनके जीवन का एक बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण अध्याय रही।
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर आधारित इस फिल्म के निर्माण में शैलेंद्र ने अपनी पूरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता झोंक दी।
फिल्म को भले ही तत्काल व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, लेकिन बाद में इसे हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना गया।
शैलेंद्र का जीवन हालांकि बहुत लंबा नहीं रहा। महज 43 वर्ष की उम्र में 14 दिसंबर 1966 को उनका निधन हो गया। इतनी कम उम्र में दुनिया छोड़ने के बावजूद उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत और साहित्य की दुनिया पर ऐसी छाप छोड़ी, जिसे मिटा पाना संभव नहीं है।
डायरी ने जोड़ा पुश्तैनी गांव से, अब विरासत सहेजने की मांग
शैलेंद्र के परिवार की जड़ों से जुड़े अख्तियारपुर के ग्रामीण आज उनके नाम और विरासत को संरक्षित करने की मांग उठा रहे हैं।
परिवार से जुड़े दस्तावेजों और डायरी के माध्यम से पूर्वजों के गांव की जानकारी मिलने के बाद शैलेंद्र के बेटे दिनेश शैलेंद्र वर्ष 2017 में और बेटी अमला शैलेंद्र वर्ष 2019 में अख्तियारपुर पहुंचीं।
उनके आने से गांव के लोगों में अपने इस महान सपूत को लेकर गौरव की भावना और मजबूत हुई। ग्रामीणों का कहना है कि जिस गीतकार ने अपनी कलम से करोड़ों लोगों के दिलों को छुआ, उसकी स्मृतियों को उसके पुश्तैनी गांव में भी सहेजा जाना चाहिए।
शैलेंद्र के रिश्तेदार संतोष कुमार दास समेत ग्रामीणों ने प्रशासन से गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित करने, पक्की सड़क बनाने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने की मांग की है।
गीतकार चले गए, गीत आज भी जिंदा हैं
शैलेंद्र को गुजरे भले ही छह दशक के करीब हो रहे हों, लेकिन उनकी कलम की आवाज आज भी सुनाई देती है। रेडियो से लेकर इंटरनेट के संगीत प्लेटफार्मों तक उनके गीत नई-नई पीढ़ियों तक पहुंच रहे हैं।
शायद यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता है—वह अपने समय से आगे निकल जाए और उसके शब्द आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी का हिस्सा बन जाएं।
आरा के अख्तियारपुर से जुड़ी शैलेंद्र की विरासत भी इसी उम्मीद के साथ अपने संरक्षण की राह देख रही है।
गांव में उनकी प्रतिमा और स्मृति स्थल की मांग पूरी होती है तो यह सिर्फ एक महान गीतकार को श्रद्धांजलि नहीं होगी, बल्कि उस साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देना भी होगा, जिसने साधारण शब्दों में जिंदगी की असाधारण सच्चाइयां कह दीं।
