तीसी के तेल में कैसे बनती है गुड़ही जलेबी? ओमेगा-3 से भरपूर, गुड़ की मिठास और देसी खुशबू के दीवाने हैं भोजपुर के लोग
भोजपुर में तीसी के तेल और देसी गुड़ से बनी गुड़ही जलेबी सर्दियों में खास लोकप्रिय है, जो दुर्गापूजा से ...और पढ़ें

परंपरा और देसी स्वाद का संगम
HighLights
भोजपुर में तीसी तेल-गुड़ से बनी गुड़ही जलेबी लोकप्रिय।
ओमेगा-3 से भरपूर, सर्दियों में खास पसंद की जाती है।
पारंपरिक स्वाद और संस्कृति का अनूठा संगम है यह।
दिलीप कुमार ओझा, शाहपुर (भोजपुर)। बदलते दौर में खानपान की परंपराएं भले ही बदल रही हों, लेकिन भोजपुर के ग्रामीण इलाकों में आज भी देसी स्वाद का जादू बरकरार है। दुर्गापूजा से लेकर फगुआ यानी होली तक तीसी (अलसी) के शुद्ध तेल में तली जाने वाली देसी गुड़ की गुड़ही जलेबी लोगों के बीच खास लोकप्रिय रहती है।
सर्दियों में गर्मागर्म गुड़ही जलेबी का स्वाद लेने के लिए लोग दुकानों पर पहुंचते हैं। देसी गुड़ की मिठास और तीसी के तेल की खास खुशबू इसे दूसरी मिठाइयों से अलग पहचान देती है।
शाहपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में गुड़ही जलेबी केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि पारंपरिक खानपान और स्थानीय संस्कृति का भी हिस्सा है।
ठंड के मौसम में इसका स्वाद लेने का अपना अलग आनंद है। खास बात यह है कि इसे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाला अलसी का तेल भी अपने पोषक तत्वों के कारण जाना जाता है।
हालांकि, दूसरे खाद्य तेलों की तुलना में इसकी कीमत अधिक होने के कारण इसका इस्तेमाल अब पहले की अपेक्षा सीमित हो गया है।
रबी फसलों के साथ होती थी तीसी की खेती
खांटी एग्रो फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक उमेश चंद्र पांडे बताते हैं कि पहले ग्रामीण घरों में तीसी के तेल का इस्तेमाल आम बात थी। किसान रबी की अन्य फसलों के साथ तीसी की खेती भी करते थे।
इसका तेल पारंपरिक भोजन का अहम हिस्सा हुआ करता था। समय के साथ खेती के तौर-तरीकों और खानपान में बदलाव आया, जिससे इसका घरेलू इस्तेमाल भी कम हुआ है।
इसके बावजूद तीसी के तेल में तैयार गुड़ही जलेबी का पारंपरिक स्वाद आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
लजीज स्वाद के साथ सुपाच्य भी
शाहपुर के जलेबी बनाने वाले चंद्रशेखर साह, श्रीभगवान पंडित,नंदन कुमार साह और सहजौली के कन्हैया साह बताते हैं कि तीसी के तेल में बनी गुड़ही जलेबी का स्वाद दूसरी जलेबियों से अलग होता है।
देसी गुड़ और तेल की खास खुशबू के कारण लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं। सर्दियों में इसकी मांग बढ़ जाती है। पारंपरिक तरीके से तैयार होने वाली यह मिठाई आज भी पुराने स्वाद के शौकीनों की पसंद बनी हुई है।
ओमेगा-3 फैटी एसिड का अच्छा स्रोत है अलसी का तेल
शाहपुर रेफरल अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डा. अतिउल्लाह अंसारी व डा. रंजन कुमार पांडे के अनुसार, अलसी के तेल में ओमेगा-3 फैटी एसिड, विशेषकर अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (एएलए), पाया जाता है।
एन्टी-इंफ़्लेमेंटरी गुण भी होते हैं। संतुलित आहार के हिस्से के रूप में इसका सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।
इसमें मौजूद आवश्यक फैटी एसिड शरीर के सामान्य कामकाज में भी भूमिका निभाते हैं। अलसी के तेल में मौजूद असंतृप्त वसा पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
हालांकि किसी खाद्य तेल के सेवन मात्र से हृदयाघात, गठिया या त्वचा संबंधी रोगों का इलाज संभव नहीं है। इसके फायदे तेल की गुणवत्ता, सेवन की मात्रा और व्यक्ति की सेहत पर भी निर्भर करते हैं।
वहीं अलसी के तेल में बनी गुड़ही जलेबी का आनंद लेते समय मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी है। क्योंकि इसमें गुड़ के साथ पर्याप्त मात्रा में तेल का इस्तेमाल होता है।
सामग्री
- मैदा — 2 कप
- गुड़ — 1 से 1½ कप
- पानी — जरूरत के अनुसार
- तीसी (अलसी) का तेल — तलने के लिए
- नींबू के रस की कुछ बूंदें — वैकल्पिक, चाशनी के लिए
बनाने का तरीका
1. घोल तैयार करें- मैदा में पानी डालकर गाढ़ा, चिकना घोल बनाएं। पारंपरिक विधि के अनुसार इसे कुछ समय ढककर रखा जा सकता है।
2. गुड़ की चाशनी बनाएं- गुड़ को पानी में गर्म करके घोलें और जरूरत के अनुसार छान लें। चाशनी को हल्का गाढ़ा होने तक पकाएं।
3. जलेबी का आकार देकर तलें- घोल को कपड़े या उपयुक्त डिस्पेंसर में भरकर गर्म तेल में गोल-गोल आकार दें। सुनहरा होने तक तलें। तीसी के तेल को बहुत अधिक गर्म न करें।
4. चाशनी में डालकर परोसें-तली हुई जलेबी को गुड़ की चाशनी में थोड़ी देर डालें, फिर निकालकर गर्मागर्म परोसें।
परंपरा और देसी स्वाद का संगम
आधुनिक मिठाइयों और बदलते खानपान के बीच तीसी के तेल में तैयार गुड़ही जलेबी भोजपुर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति की याद दिलाती है।
दुर्गापूजा से होली तक चलने वाला इसका स्वाद लोगों को गांव की पुरानी परंपराओं से जोड़ता है। यही वजह है कि सर्दियों में गर्मागर्म गुड़ही जलेबी की मिठास और देसी खुशबू आज भी लोगों के दिलों में खास जगह बनाए हुए है।
