आरा में चार बच्चों पर चार शिक्षक, सालाना 25 लाख खर्च; फिर भी सरकारी स्कूल से मुंह मोड़ रहे अभिभावक
बिहिया के दुबौली प्राथमिक विद्यालय में केवल चार बच्चों पर चार शिक्षक तैनात हैं, जिस पर सालाना 25 लाख रुपये ...और पढ़ें

बिहिया के दुबौली प्राथमिक विद्यालय
HighLights
दुबौली प्राथमिक विद्यालय में चार बच्चों पर चार शिक्षक।
स्कूल पर सालाना 25 लाख रुपये का सरकारी खर्च।
अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कौशल कुमार मिश्रा,बिहिया(भोजपुर)। बिहिया के दुबौली प्राथमिक विद्यालय की तस्वीर सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। विद्यालय में महज चार बच्चे नामांकित हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए चार शिक्षक पदस्थापित हैं।
पहली, दूसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा में एक-एक बच्चा है, जबकि तीसरी कक्षा में एक भी नामांकन नहीं है। मंगलवार को पड़ताल के दौरान तीन बच्चे ही स्कूल पहुंचे।
गांव में बच्चे हैं, मगर सरकारी स्कूल की कक्षा खाली
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गांव में बच्चों की कमी नहीं है तो सरकारी स्कूल में नामांकन इतना कम क्यों है? ग्रामीण इलाकों से निजी स्कूलों की गाड़ियां बच्चों को लेकर गुजरती हैं, लेकिन दुबौली के सरकारी विद्यालय में बच्चे नहीं पहुंचते। स्कूल भवन ठीक है और शिक्षकों की ओर से नामांकन अभियान चलाने का दावा भी किया गया है।
चार बच्चों पर 25 लाख का सरकारी खर्च
शिक्षकों के वेतन और स्थापना मद के दूसरे खर्चों को जोड़ें तो विद्यालय पर सालाना करीब 25 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है।
यानी बेहद कम नामांकन वाले इस स्कूल पर सरकारी संसाधन तो लग रहे हैं, लेकिन उसका लाभ लेने वाले बच्चों की संख्या बेहद कम है। सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, बल्कि संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का भी है।
एक कमरे में अलग-अलग कक्षाओं की पढ़ाई
पड़ताल के दौरान पहली, दूसरी और पांचवीं कक्षा के बच्चों को एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाया जा रहा था। कुछ बच्चे पास के आंगनबाड़ी केंद्र से भी वहां पहुंचे थे, लेकिन वे विद्यालय में नामांकित नहीं थे।
प्रधानाध्यापक रंजन कुमार के अनुसार, दो शिक्षक आठवीं की कॉपियों के मूल्यांकन के लिए बाहर गए थे और एक शिक्षक को बीएलओ का दायित्व मिला हुआ है।
अभिभावकों का भरोसा निजी स्कूलों पर
ग्रामीणों की बातों से सरकारी स्कूल के सामने एक अलग चुनौती सामने आती है। संतोष ओझा ने बताया कि उनके बच्चे निजी स्कूल में पढ़ते हैं।
हरेंद्र दुबे के मुताबिक अभिभावक कम उम्र से ही बच्चों को नर्सरी और एलकेजी में भेजना चाहते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि निजी स्कूलों में पढ़ाई के साथ खेल और दूसरी गतिविधियों के अवसर भी मिलते हैं।
अब नामांकन नहीं बढ़ा तो मर्ज होगा स्कूल
बिहिया के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी मनोज कुमार ने कहा कि बच्चों की कम संख्या की जानकारी है। शिक्षकों ने नामांकन अभियान चलाया है और वे खुद घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करेंगे। इसके बाद नामांकन शिविर लगाया जाएगा।
अगर इसके बावजूद स्थिति नहीं सुधरी तो विद्यालय को नजदीकी स्कूल में मर्ज कर वहां के बच्चों को भेजने पर विचार किया जाएगा।
