जागरण सवांददाता, भागलपुर। मरीज को अगर खून चढ़ाना आवश्यक है तो पहले उसकी पूरी तरह जांच करनी आवश्यक है, क्योंकि अगर संक्रमित खून चढ़ाया गया तो मरीज हेपेटाइटिस बी रोग से भी ग्रस्त हो सकता है। ऐसे दो फीसद मरीज इलाज करवाने आ रहे हैं जो किसी निजी संस्था या दलाल के माध्यम से खून हजारो रुपये में लिया और चढ़वाने के बाद हेपेटाइटिस बी से ग्रस्त भी हो गए। जवालहलाल लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आउटडोर में प्रतिदिन पांच से सात ऐसे मरीज इलाजे करवाने आते हैं, जो हेपेटाइटिस बी से बीमार हैं।

हेपेटाइटिस बी होने के ये भी कारण हैं

मेडिकल कॉलेज अस्पताल मेडिसिन विभाग में कार्यरत वरीय डा आरपी जायसवाल ने कहा कि नस या मांस के जरिये खून, स्लाइन, संक्रमित निडिल से सुई देने से मरीज हेपेटाइटिस बी रोग से ग्रस्त हो जाता है। ऐसे कई मरीज मिले हैं जिन्होंने बाहर इलाज के दौरान खून, स्लाइन चढ़वाया या संक्रमित निडिल से सुई दी गयी। इसके अलावा कान छेदवाने, टेटू बनवाने, संक्रमित माता से गर्भस्थ शिशु हेपेटाइटिस बी हो सकता है। इसलिए वैसे सरकारी अस्पतालों में खून लेना चाहिए जहां खून की जांच करने के बाद मरीज को चढ़ाया जाता है। इससे संक्रमण का खतरा नही होता। इसके अलावा असुरक्षित यौन संबंध से भी रोग होता है फिजिसियन डा मनीष ने कहा कि बच्चे भी हेपेटाइटिस बी से ग्रस्त होते हैं, ज्यादातर में के गर्भ में ही वे संक्रमित हो जाते हैं।

हेपेटाइटिस बी के लक्षण

थकान होना, उल्टी, पेट मे दर्द होना, स्कीन और आँखों मे पीलापन होना, लाल और गहरे रंग का पेशाब होना, सिर दर्द, जी मिचलाना, खुजली होना लक्षण हैं। हेपेटाइटिस बी लीवर को ज्यादा प्रभावित करता है। खून की जांच और अल्ट्रासाउंड से रोग की जानकारी मिलती है।

देश मे चार करोड़ मरीज हैं

डब्लूएचओ के 2017 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक देश मे चार करोड़ लोग हेपेटाइटिस बी के मरीज हैं। 2030 में हेपेटाइटिस बी के उन्मूलन का लक्ष्य भी रखा गया है।

नहीं चलाया जा रहा जागरुकता अभियान

केवल हेपेटाइटिस बी का टीका सरकारी अस्पतालों में दिया जाता है। लेकिन कभी भी लोगो को हेपेटाइटिस बी की जानकारी या इससे बचने के लिए चिकित्सक संघों के जरिये जागरूकता अभियान नही चलाया गया है। हालांकि सिविल सर्जन डा उमेश शर्मा ने कहा कि जन्म के 24 घंटे के भीतर नवजात को टीके लगाए जा रहे हैं।

 

Edited By: Dilip Kumar Shukla