भागलपुर [विकास पाण्डेय]। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला का उद्घाटन उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी शुक्रवार को सुल्‍तानगंज में करेंगे। इसके बाद मेला शनिवार से शुरू होकर एक माह तक चलेगा। इस मेले में केसरिया वस्त्रधारी भक्त कांवर में सुल्तानगंज स्थित उत्तर वाहिनी गंगा का जल लेकर 105 किलोमीटर पैदल पांव यात्रा कर वैद्यनाथधाम जाते हैं और भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक करते हैं। वे एक दूजे को 'बम' कह कर संबोधित करते हैं। सभी एक-दूसरों का सहयोग करने को तत्पर रहते हैं। इससे यह मेला विश्व बंधुत्व का मिनियेचर सा दिखता है।

दुनिया का सबसे लंबा मेला

पूरे कांवरिया पथ पर कांवरियों के विश्राम व अन्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए सरकार सरकार व निजी संस्थाओं द्वारा पर्याप्त व्यवस्था की गई है। पथ के दोनों ओर होटलों व विभिन्न दुकानों की बाढ़ सी आ गई हैं। बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज स्थित गंगा तट से झारखंड के बैद्यनाथ धाम तक एक महीने तक लगने वाले इस 105 किलोमीटर अटूट मेले को दुनिया का सबसे लंबा मेला माना जाता है।

30 लाख कांवरिया करते जलाभिषेक

एक आंकड़े के अनुसार एक माह तक चलने वाले श्रावणी मेले में करीब 30 लाख कांवरिया श्रद्धालु बाबा का जलाभिषेक करने जाते हैं। मेले में अरबों की खरीद-बिक्री होती है और करीब 30 हजार स्थायी व अस्थाई दुकानदार आकर्षक आय अर्जित करते हैं। 

जानिए, कब से शुरू हुआ श्रावणी मेला

धर्मग्रंथों के अनुसार पहले कांवरिया रावण थे। त्रेता युग में भगवान रामचंद्र ने अयोध्या का राजा बनने के बाद सुल्तानगंज से जल भर कर कांवर यात्रा कर भगवान वैद्यनाथ का जलाभिषेक किया था। कहते हैं तभी से इस कांवरिया मेले की परंपरा चली आ रही है। लेकिन इसमेंआज जैसी भीड़ 1970-80 के दशक से बढऩी शुरू हुई।

रास्ते में पड़ते हैं कई पड़ाव

बिहार के सुल्तानगंज से झारखंड राज्य के देवघर तक के 110 किलोमीटर लंबी दूरी में कई पड़ाव हैं। इनमें सुल्तानगंज व धांधी बेलारी भागलपुर , मनिया मोड़, कुमरसार मुंगेर, सूइया, कटोरिया, इनारावरण व गोडिय़ारी बांका तथा दुम्मा झारखंड के बांका जिले में हंै। इन पड़ाव स्थलों पर कांवरियों के विश्राम के लिए विभिन्न सुविधाओं से युक्त सरकार व गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से विभिन्न सुविधाओं से युक्त धर्मशालाएं व पंडाल लगाए गए हैं।

मध्य राह में बांका जिले के अबरखा गांव के पास दैनिक जागरण का भी कांवरिया शिविर लगा है। वहां थके-हारे कांवरियों के विश्राम, भोजन, पांव के जख्म दूर करने के लिए दवाएं, गर्म पानी से पांव सेंकने, चिकित्सक की देखरेख में चिकित्सा सुविधा, भजन संध्या आदि की सुविधाएं श्रद्धालुओं को राहत प्रदान करती हैं।

किस्म-किस्म के कांवर

कांवर मखमल के आकर्षक कपड़े से लिपटी बांस की बहंगी होती है, जिसके दोनों ओर जल पात्र रखने के लिए रस्सी के झूले लटके रहते हैं। वह घंटियां, फूल की मालाएं, प्लास्टिक के सर्प, ऐनक आदि से सजा-धजा होता है। आजकल एलइडी रोशनियों से जगमगाते कांवर भी मिल रहे हैं। महंगे धातु , साज-सज्जा व उनके आकार-प्रकार के हिसाब से कांवर विभिन्न किस्मों के होते हैं। मिथिला के कांवरिये कृषि कार्य पूरा कर सावन के बजाय भाद्र मास में कांवर यात्रा शुरू करते हैं। वे कांवर के एक तरफ गंगाजल व पूजा के सामान तथा दूसरी ओर भोजन पकाने के पात्र आदि साथ लेकर चलते हैं। इसलिए उनका कांवर सामान्य कांवर से अलग बड़े आकार का होता है। उनकी बहंगी मोटे बांस की बनी होती है।

तरह-तरह के कांवरिए, नाम एक: 'बम'

कांवरिए कई तरह के होते हैं। सबके अलग-अलग प्रकार, लेकिन एक नाम। सभी कांवरिए 'बम' के नाम से संबोधित किए जाते हैं। मेला के दौरान कांवरिया पथ इस शिवभत बमों से पट जाता है। इनमें सामान्य कांवरिया सुल्तानगंज से वैद्यनाथधाम तक की यात्रा विभिन्न पड़ावों पर विश्राम करते हुए पूरी करते हैं। बिना रूके देवघर मंदिर तक की यात्रा 24 घंटे के अंदर पूरी करने वाले डाक कांवरिया या डाक बम कहलाते हैं। खड़ा कांवरिया विश्राम करते हुए आगे बढ़ते हैं। लेकिन इस दौरान कोई सहयोगी कांवर को कंधे पर रख कर चलने की मुद्रा में उसे हिलाते-डुलाते रहते हैं। दांडी कांवरिया 105 किलोमीटर की दूरी दंड देते हुए पूरी करते हैं। वे थक  जाने पर विश्राम करते हैं और फिर तय की हुई दूरी से आगे का रास्ता तय करते हैं। उन्हें यात्रा पूरी करने में 20-22 दिन लग जाते हैं।

बाबा का तिलकोत्सव करने आते हैं मिथिला के कावंरिये

मिथिला यानी प्राचीन विदेह के अंतर्गत ही हिमालय पर्वत पड़ता था। माता पार्वती हिमालय की पुत्री थीं। इसे लेकर उनके मायके मिथिला से बड़ी संख्या में कांवरिये बसंत पंचमी के दिन भगवान महादेव का तिलकोत्सव करने वैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं। वे तिलकहरू कहलाते हैं। बसंत पंचमी को वे बाबा भोलेनाथ का तिलकोत्सव करते हैं और जलाभिषेक के साथ उन्हें अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं। बाबा मंदिर में वे आपस में भी हर्षोल्लासपूर्वक अबीर-गुलाल खेलते हैं। यह उत्सव बड़ा ही मनोरम होता है।

गोडिय़ारी नदी के जलवे

इनारावरण से करीब 10 किमी दूर आठवां पड़ाव बांका जिले का गोडिय़ारी है। यहां कांवरिया बच्चे व युवा चांदन की पतली धारा में स्थान कर गर्मी से राहत पाते हैं। यहां सजे-धजे घोड़े पर बैठ कर कांवरिये फोटो खींचा सकते हैं और पानी के बीच कुर्सी-टेबुल पर नाश्ते का भी आनंद ले सकते हैं। यहां से बस पांच किमी की दूर ही नवां पड़ाव दुम्मा है, जो देवघर जिले में है।

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