बांका [राहुल कुमार]। कुआं का गावों से काफी समय तक गहरा जुड़ाव रहा है। इसकी संस्कृति और जीवन इससे जुड़ा रहा है। लेकिन अब शहर क्या गांवों में भी कुआं का दर्शन दुर्लभ हो गया है। शादी विवाह में लगहर तक की रस्म चापानल से पूरी करना मजबूरी हो गई है। अधिकांश गांव अब कुआं विहीन हो गया है। ऐसे में बांका जिला मुख्यालय के समीप का मदौड़ा गांव का सौ कुआं हर किसी के लिए किसी रहस्य से कम नहीं है। आश्चर्य यह कि गांव का अधिकांश कुआं अब भी जिंदा है। मदौड़ा का कुआं मानव जीवन के लिए अब भी लोगों के लिए उपयोगी बना हुआ है। पीने नहाने से लेकर जीवन यापन का हर जरूरी काम इस पर हो रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि इस गांव के खेतों की अधिकांश सिंचाई अब भी इस कुआं पर ही निर्भर है। कुआं की अधिकता के कारण आपको बहियार में हर जगह सिंचाई का परंपरागत साधन डंडा-कुड़ भी दिख जाएगा। किसान छोटे रकबा के खेतों की सिंचाई कर इस डंडा कुड़ से तेज गर्मी में भी बहियार को हरा भरा रखे हुए हैं।
सिंचाई का रहा परंपरागत स्त्रोत
किसान बमबम पंडित, रघु पंडित, दीपक, सागर आदि बताते हैं कि गांव में परंपरागत रूप से कुआं खुदा है। पहले सौ से भी अधिक कुआं रहा होगा। ग्रामीण बताते हैं कि यह इलाका आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी पिछड़ा रहा है। जमीन के नीचे पत्थर का बड़ा-बड़ा चट्टान भी है। हो सकता है कि पहले आर्थिक कारणों से लोग महंगा बोरिंग नहीं करा सके होंगे।
ग्रामीणों ने आपसी सहयोग कर कुआं खोद लिया। इस खुदाई में निकले पत्थरों को इसके किनारे लगाकर इसे मजबूत भी बना दिया है। इससे यह टिकाउ बन गया है। ग्रामीणों ने बताया कि अधिकांश कुआं को खेत वाले जिंदा रखे हुए हैं। आधुनिक संसाधन के बाद अब कुछ लोग इसी कुआं में पंपसेट और जेटसेट भी लगाकर खेती कर रहे हैं। लेकिन कुआं को बंद नहीं किया जा रहा है। कुछ कुआं का उपयोग कम होने से इसमें कुछ गंदगी भले हैं। लेकिन अधिकांश कुआं में पानी मौजूद है। इसी कुआं के भरोसे गांव की खेत तेज धूप में भी सब्जी और मक्का से हरा है। अब मशीन से बोरिंग होने के बाद भी गांव के लोगों ने कुआं को सुरक्षित रखा है।
जल संरक्षण का काम देख रहे जयंत वाजपेई बताते हैं कि कुआं की इतनी संख्या रहने से गांव का भूजलस्तर कभी कमजोर नहीं होगा। छोटे कुआं का पानी सूख जाने पर उसमें फिर कुछ देर बाद पानी का संग्रहण हो जाता है।
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