लखीसराय [अनंत कुमार]। बड़हिया में तूफान एक्सप्रेस के ठहराव के लिए 1957 में भी आंदोलन किया गया था। उस आंदोलन में ट्रेन से कटकर चार लोगों की जान चली गई थी। बड़हिया के वयोवृद्ध ग्रामीण डॉ. सत्येंद्र अरुण, शिवबालक सिंह व आनंदी पहलवान बताते हैं कि उस वक्त वे लोग नाबालिग थे। उनके बुजुर्गों ने उन्हें बताया था कि बड़हिया रेलवे स्टेशन पर तूफान एक्सप्रेस का ठहराव नहीं था।

उक्त ट्रेन के ठहराव की मांग के लिए ग्रामीण रेलवे स्टेशन की अप लाइन पर धरना पर बैठे थे। सुरक्षा में लगे पुलिस जवानों ने ट्रेन के आने की सूचना से पहले सबको हटाने का प्रयास किया, लेकिन चार लोग बैठे ही रह गए थे। तत्कालीन मुंगेर जिले के जिलाधिकारी एवं सरकार का सख्त निर्देश था कि तूफान एक्सप्रेस को बड़हिया स्टेशन पर नहीं रोकना है। किऊल स्टेशन पर उस वक्त ट्रेन के इंजन एवं ड्राइवर को बदलकर आगे के लिए रवाना किया गया। तूफान एक्सप्रेस उक्त चारों धरना दे रहे लोगों को रौंदते हुए बड़हिया स्टेशन से गुजर गई। अगले स्टेशन मोकामा में जाकर यह रुकी। उस दुर्घटना में रेल ड्राइवर या अन्य किसी रेल कर्मी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। उसके आठ महीने बाद तूफान एक्सप्रेस ट्रेन का ठहराव बड़हिया में दे दिया गया।

फ‍िर उठी ट्रेनों के ठहराव की मांग

कोरोना काल के दौरान बंद हुई ट्रेनों का संचालन पुन: शुरू किए जाने के बाद भी बड़हिया रेलवे स्टेशन पर ठहराव नहीं दिए जाने के विरोध में एवं पूर्व की तरह सभी ट्रेनों का ठहराव देने की मांग के समर्थन में रविवार से अनिश्चितकालीन आमरण अनशन शुरू हो गया है। ग्रामीणों द्वारा इसके पहले रेल मंत्री भारत सरकार एवं रेल विभाग के वरीय अधिकारियों सहित जिले के सभी प्रशासनिक पदाधिकारियों को एक जनवरी को इससे संबंधित आवेदन दिया गया था। आवेदन में  15 दिनों के अंदर बड़हिया स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव दिए जाने की मांग की गई थी।

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