जागरण संवाददाता, सुपौल। Jivitputrika Vrat कभी कोसी क्षेत्र की मड़ुआ मुख्य फसल होती थी। बलुआही मिट्टी पर किसान इसकी खेती करते थे। इसकी सिंचाई की भी व्यवस्था किसानों को नहीं करनी पड़ती थी। बारिश से इसकी सिंचाई हो जाती थी। मड़ुआ की फसल अब इस इलाके से लगभग विलुप्त सी हो गई है। इसकी याद लोगों को जिउतिया व्रत में आती है। जिउतिया के नहाय-खाय के दिन मिथिला में मड़ुआ की रोटी खाने का विधान है। जानकारों के मुताबिक मड़ुआ पौष्टिक होता है इसलिए जिउतिया पर्व में इसकी रोटी खाने का चलन है। अब सरकार मोटी फसलों को बढ़ावा देने पर काम कर रही है। उम्मीद है कि आनेवाले दिनों में किसानों के खेतों में मड़ुआ की फसल लहलहाएगी।

त्रिवेणीगंज के किसान शैलेंद्र मोहन सिंह, कौशलीपट्टी के मिश्रीलाल यादव, चौघारा के लक्ष्मण यादव आदि बताते हैं कि इस इलाके में जब कोसी उन्मुक्त बहती थी तो हर साल बाढ़ आना तय माना जाता था। बाढ़ के पानी के साथ आई बालू खेतों में जम जाती थी। सिंचाई के साधन नहीं होने के कारण लोग वर्षा पर निर्भर रहते थे। ऐसे में किसानों के मनमाफिक खेती नहीं हो पाती थी। किसानों को परंपरागत खेती करनी पड़ती थी। इसमें मड़ुआ की खेती भी शामिल थी। इस खेती में किसानों का खर्च नहीं के बराबर था। घर का बीज और बारिश से सिंचाई। किसान जमकर इसकी खेती करते थे। कालांतर में कोसी की नहर प्रणाली विकसित हुई तो खेती के स्वरूप भी बदल गए। मोटी फसलें जैसे मड़ुआ, ज्वार, बाजरा आदि अब बीते दिनों की बात हो गई।

किसानों का कहना है कि अब तो जिउतिया के लिए बाजार से एक सौ रुपये किलो मड़ुआ का आटा खरीदना पड़ता है। इस संबंध में पूछे जाने पर राघोपुर कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि विज्ञानी प्रमोद कुमार बताते हैं कि मोटे अनाज जैसे मड़ुआ, बाजरा, ज्वार के सेवन का प्रचलन समाज में कम हो गया है। इससे भी लोग कुपोषण का शिकार होने लगे हैं। इसके लिए सरकार मोटी फसलों को बढ़ावा दे रही है। केंद्र के विज्ञानियों द्वारा ज्वार, बाजरा, मड़ुआ के खेती का प्रशिक्षण भी दिया गया है। बताया कि भारत सरकार के द्वारा विश्व स्तर पर 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया गया है। इस समय तक मोटे अनाज की खेती एवं इसके उत्पादन पर विशेष बल दिया जाएगा।

Edited By: Shivam Bajpai