भागलपुर [संजय कुमार सिंह]। लेफ्ट पार्टियां भागलपुर व बांका की राजनीति में अप्रासंगिक होती जा रही हैं। इनकी नीतियों, कार्यक्रमों और विचारों को जनता स्वीकार नहीं कर रही है। इसी कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) लोक सभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक में धराशाई होती जा रही है। कभी भागलपुर और बांका में पार्टी की दखल थी।

1957 में भागलपुर से सीपीआइ के सत्येंद्र नारायण अग्रवाल विधायक रहे। उसके बाद भागलपुर में कांग्रेस और भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया। राजनीतिक विचारधारा के विस्तार और विकास में भी पीछे रहने की वजह भागलपुर और बांका जिले में वामपंथ का किला दरकता चला गया। नतीजा, कार्यकर्ता शिथिल हो गए और मतदाताओं ने वामपंथ को नकारा दिया। व्यवहार के आधार पर विचारधारा बड़ी आकर्षक लगती है, क्योंकि वह सभी की समानता की बात करती है। हालांकि, जदयू के सुल्तानगंज विधायक सुबोध राय भी कभी वामपंथी रह चुके थे। तब, वामपंथियों के अलावा राजद व कांग्रेस के वोट भी उनकी झोली में गिरे थे। चुनाव जीतने के बाद वे जदयू में शामिल हो गए। सुबोध राय भागलपुर के सांसद भी रह चुके हैं। भाकपा के मुकेश मुक्त कहते हैं कि भागलपुर-बांका जिलों में गोपालपुर, बिहपुर, पीरपैंती व धौरेया में पार्टी का जनाधार था।

पीरपैंती से अंबिका प्रसाद विधायक भी रहे। पार्टी से कार्यकर्ता आज भी जुड़े हैं, लेकिन वे सुस्त हो गए हैं। इनका आरोप है कि शीर्ष कमेटी में बैठे नेताओं की चुप्पी की वजह से पार्टी की आक्रामकता समाप्त होती दिख रही है। जब जनसरोकार के मुद्दे पर पार्टी का नेतृत्व सक्रिय नहीं होता। इससे वामपंथ का किला दरकता दिख रहा है। धरातल पर ऐसा नहीं है। जब कभी शीर्ष नेतृत्व आंदोलन का आह्वïन करता है तो सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर सड़क पर उतर जाते हैं। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि पार्टी कार्यकर्ता कहीं दूसरी जगह शिफ्ट कर गए हैं। गठबंधन का दौर चल रहा है। उसी के हिसाब से सीटों का बंटवारा है। कहीं हमारा जनाधार होता है तो वहां सीटों का समीकरण नहीं बनता। इससे लोगों लगता है पार्टी कमजोर हो गई है। यदि शीर्ष नेतृत्व फिर से सक्रिय हो जाए तो समीकरण बदल जाएंगे। पुरानी सीटों पर फिर पार्टी जीत हासिल करेगी।

 

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस