भागलपुर [जितेंद्र कुमार]। अपनी मिठास और भरपूर रस के चलते भागलपुर के गन्ने की पहचान कभी देश के कई राज्यों में थी। किसान इसे नकदी फसल के रूप में उपजाते थे। अन्य फसलों के मुकाबले बढ़िया मुनाफा होता था, लेकिन संसाधनों के अभाव में इसका रकबा सिमटता चला गया। जिले में चार दशक पहले 2500 हेक्टेयर में खेती होती थी, अब 499 हेक्टेयर में ही इसकी खेती हो रही है। सिंचाई के साधन और उचित कीमत नहीं मिलने की वजह से किसान इसकी खेती से विमुख हो गए। किसानों को मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ा।

गन्ने की मिठास अब गुम होने लगी है। नाथनगर प्रखंड की विशनरामपुर, कजरैली और गौराचौकी तीन पंचायतों में चार दशक पहले 200 एकड़ में गन्ने की खेती होती थी। 1970 से 80 तक गन्ने की पैदावार अधिक हुआ करती थी। अब 30 एकड़ में ही गन्ने की खेती होती है। बेलसिरा गांव के किसान शिव यादव कहते हैं कि गन्ने की खेती से किसानों को काफी लाभ होता था। गांव भी खुशहाल था। बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी। सिंचाई की पर्याप्त सुविधा थी नहीं। फसल में बीमारी और वाजिब कीमत भी नहीं मिल पाता था। इसलिए किसानों ने गन्ने की खेती से मुंह मोड़ लिया। अब 10 फीसद किसान ही खेती कर रहे हैं। शेष इसकी जगह धान और अन्य फसलों की खेती करने लगे हैं।

मिल संचालकों ने भी किया दोहन : बेलसिरा गांव में तीन गुड़ मिल थे। दो दशक पहले ही ये बंद हो गए। इसके बाद निजी गुड़ उत्पादक गन्ना किसानों का शोषण करने लगे। अब भी जो किसान गन्ने की खेती करते हैं उन्हें गुड़ मील मालिकों को औने-पौने दामों में गन्ना बेचना पड़ता है। समय पर पैसे भी नहीं मिलते। मील में 15 दिनों तक रखने के बाद वजन भी कम हो जाता है।

गन्ना विकास की कोई योजना फिलहाल नहीं है। सबसे अधिक पीरपैंती, सन्हौला व कहलगांव के साथ नाथनगर में खेती होती थी। किसानों के हित में योजना तैयार कर सरकार को भेजी जाएगी। - रविंद्र कुमार, सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण विभाग भागलपुर

मुख्य बातें

सिंचाई की सुविधा नहीं मिलने से किसानों ने छोड़ दी गन्ने की खेती

गन्ना किसानों को मजदूरी के लिए करना पड़ रहा पलायन कुछ संभाल रहे विरासत

चार दशक पहले 2500 हेक्टेयर में होती थी गन्ने की खेती, अब रह गया महज 499 हेक्टेयर रकबा

Posted By: Dilip Shukla

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