भागलपुर [विकास पाण्डेय]। शहर के गंगा किनारे स्थित मानिक सरकार मोहल्ले की मुख्य सड़क का आखिरी मकान यहां का संभवत: सबसे पुराना भवन है। यह हवेली प्रख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के परनाना की है।

इस मोहल्ले के कई दर्जन मकान मालिक जहां विभिन्न कारणों से अपने मकान बेचकर कोलकाता या अन्यत्र जा बसे, वहां करीब 200 सालों से आबाद इस हवेली में आज इसकी पांचवीं-छठी पीढ़ी के मालिकान उज्ज्वल कुमार गांगुली और शांतनु गांगुली व इनके बेटे-बेटी रह रहे हैं। उज्ज्वल कुमार गांगुली बताते हैं कि इनके छरदादा रामधन गंगोपाध्याय आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने बंगाल के हाली नगर से भागलपुर आ बसे थे। प्रतिभाशाली होने के कारण ब्रिटिश सरकार में उन्हें यहां ऊंचा पद मिला था। उनके पुत्र केदारनाथ गांगुली इनके परदादा थे। उनके पांच पुत्रों व दो पुत्रियों में सुरेंद्रनाथ गांगुली व भुवन मोहिनी शामिल थीं। सुरेंद्रनाथ गांगुली इनके दादा थे। उनकी बड़ी बहन भुवन मोहिनी की शादी पश्चिम बंगाल के देवानंदपुर के मोतीलाल चट्टोपाध्याय से हुई थी।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय उनके पुत्र थे। परदादा दुर्गाचरण एमइ स्कूल के सेक्रेटरी थे। उन्होंने नन्हें नाती शरतचंद्र को उसी में दाखिला दिला दिया था। वहां तीन साल पढ़ाई कर छठी कक्षा पास करने के बाद उन्होंने इंग्लिश स्कूल में पढ़ाई की थी। उन्होंने टीएनजे कॉलेजिएट स्कूल से मैटिक की परीक्षा पास की थी। सुरेंद्रनाथ गांगुली शरतचंद्र के हमउम्र होने के कारण उन दोनों में खूब छनती थी।

बांग्ला साहित्य प्रेमी शांतनु गांगुली बताते हैं, छात्र शरतचंद्र अपने अध्ययन कक्ष को सजाकर रखते थे। आलमारी पर जिल्द लगी उनकी किताबें करीने से सजी रहती थीं। इनके सबसे छोटे परदादा अघोरनाथ गांगुली के बेटे मणींद्रनाथ भी शरत के सहपाठी थे। उनकी मां कुसुम कामिनी पढ़ी-लिखी साहित्य प्रेमी महिला थीं। छठी कक्षा पास करने पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने उन्हें पुरस्कृत किया था। वे हर सप्ताह महिला मंडली में बंकिमचंद्र, माइकेल मधुसूदन आदि के बांग्ला उपन्यास व काव्य पढ़कर सुनाती थीं। किशोर शरत भी उन्हें सुनते थे। एक बार रवींद्रनाथ की एक रचना सुनकर उनके नेत्र गीले हो गए थे। आंसू पोछते-पोछते वे गोष्ठी से बाहर निकल गए थे। शांतनु कहते हैं कि कई लेखक भी मानते हैं कि शरतचंद्र को साहित्य के प्रति रुचि जगाने में कुसुम कामिनी की इस गोष्ठी का अहम योगदान था। इसलिए नानी कुसुम कामिनी ही उनकी पहली साहित्यिक गुरु थीं।

पूजा में अक्सर आते थे भागलपुर

उज्ज्वल गांगुली बताते हैं शरतचंद्र कई बार भागलपुर आए थे। जगधात्री पूजा में अक्सर वे यहां आते थे। वे बंगाल से दूसरी बार 1893 में यहां आए थे। उस समय तक उनके संगी-साथी इंटर पास कर चुके थे। हारमोनियम, तबला आदि भी वे बजा लेते थे। फलत: यहां होने वाली युवा संगीत गोष्ठी में उनका सिक्का जम जाता था।

इसी भवन में लिखी थी पहली कहानी

वह कहते हैं, उन्हीं दिनों इन्होंने मंदिरा शीर्षक कहानी लिखी थी। लेकिन शर्म के कारण अपने नाम के बजाय सुरेंद्र मामा के नाम से प्रकाशित कराई थी। उसके कुछ समय बाद से इन्होंने भागलपुर में चोरी छिपे देवदास उपन्यास भी लिखना शुरू कर दिया था।

 

Posted By: Dilip Shukla

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