आनलाइन डेस्क, भागलपुर। Sankashti Chaturthi 2021: आज अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है। इस दिन को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इसे विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश (Lord Ganesh) को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर विघ्नहर्ता गणेश (Vighnaharta Ganesh) सारे दुखों का निवारण करते हैं। इस दिन व्रत भी रहा जाता है। चलिए जानते हैं व्रत कथा और पूजा की विधि।

संकष्टी चतुर्थी पर व्रत रखने से विघ्नहर्ता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सभी संकट दूर होते हैं और घर में शांति, यश और वैभव की समृद्धि होती है। मान्यता है कि बप्पा की पूजा करने से कुंडली में मौजूद बुध दोष का निवारण होता है। घर से सारी नेगेटिव एनर्जी का नाश हो जाता है। चंद्र दर्शन के लिए भी ये दिन शुभ माना गया है। चंद्र दर्शन के बाद ही पारण (व्रत खोला) जाता है। एक साल में संकष्टी के 13 व्रत रखे जाते हैं।

इन 13 व्रत का अपना अलग महत्व है। गणपति महाराज की संकष्टी चतुर्थी के दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ व्रत और व्रत कथा सुनी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि बिना कथा सुने व्रत पूरा नहीं होता है। 

संकष्टी चतुर्थी कथा (Sankashti Chaturthi Katha)

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की कथा इस प्रकार है- जब भगवान विष्णु की शादी धन की देवी मां लक्ष्मी जी के साथ तय हुई, तब विवाह में शामिल होने हेतु निमंत्रण सभी देवी-देवताओं को दिया जा रहा था। लेकिन गणेश जी को विवाह में आमंत्रित नहीं किया गया। लगन मुहूर्त के अनुसार बारात वाले दिन सभी देवी-देवता अपनी पत्नियों के साथ विष्णु भगवान और मां लक्ष्मी की शादी समारोह में पहुंच जाते हैं। 

इस कार्यक्रम में गणेश जी नहीं पहुंचते हैं। उनकी गैर मौजूदगी में सभी देवी-देवता आपस में गणेश जी के आने की चर्चा करने लगते हैं और उनके न आने का कारण भगवान विष्णु से पूछते हैं। इसपर भगवान विष्णु देवी-देवताओं के जवाब देते हैं कि गणेश जी के पिता भोलेनाथ को न्योता भेज दिया गया है। अगर उन्हें आना होता तो वे अपने पिता भगवान शिव के साथ आ जाते, अलग से न्योता देने की आवश्यकता नहीं है।

विष्णु जी कहते हैं कि अगर गणेश जी आते हैं तो उन्हें सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोज दिनभर खाने के लिए चाहिए। दूसरों के घर जाकर इतना कुछ खाना, ये अच्छी बात नहीं है। अगर गणेश जी नहीं आएंगे, तो कोई बात नहीं। इसी दरम्यान किसी ने सलाह दे दी कि गणेश जी आ भी जाएं, तो उन्हें द्वारपाल बना दिया जाए और घर के बाहर बैठा दें। सुझाव में कहा गया कि गणेश जी अपनी सवारी चूहे पर बैठकर बहुत धीरे-धीरे चलेंगे और बारात में सबसे पीछे रहेंगे। इसलिए यही उचित है कि वो घर के बाहर द्वारपाल बैठें, सभी को ये सलाह अच्छी लगी। इसके बाद जब गणेश जी विष्णु जी के विवाह में पहुंचे तो सुझाव के अनुसार उन्हें घर की रखवाली के लिए घर के बाहर बैठा दिया गया।

अब अपना किरदार निभाने पहुंचे नारद जी स्वभाव अनुसार गणेश जी से बारात में न जाने का कारण पूछ लेते हैं। इसपर गणेश जी कहते हैं कि भगवान विष्णु ने मेरा बहुत अपमान किया है। वहीं, नारद जी द्वारा गणेश जी को सलाह दी कि आप अपनी मूषक सेना (चूहों की फौज) को आगे भेज दें, ताकि वो रास्ता खोद दें और उनका वाहन धरती पर फंस जाए, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा। नाराद जी की इसी सलाह पर मूषक सेना भेजी जाती है और वो धरती खोद देती है, जिसमें विष्णु जी का रथ फंस जाता है।

लाख कोशिश के बाद भी तब उनका रथ नहीं निकलता है तो नाराद जी ने कहते हैं कि आपने गणेश जी का अपमान किया है, अगर मान-मनौव्वल कर उन्हें बुला लिया जाए तो आपका कार्य पूरा होगा। सब कुछ सिद्ध हो जाएगा। इसपर भगवान शिव अपने दूत नंदी को भेजते हैं ताकि वे गणेश जी को लेकर आ जाएं।

इसके बाद गणेश जी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया गया, तब रथ के पहिए जमीन से निकले। जमीन में फंसे होने के चलते ये बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। यहां ये सवाल खड़ा होने लगा कि अब इसकी मरम्मती कौन करेगा। वहीं पास के खेतों में काम कर रहे खाती को बुलाया गया। उन्होंने रथ के पहिए बनाने से पहले जोर से कहा, 'श्री गणेशाय नमः'। इसके बाद देखते ही देखते पहिए सही हो गए। और बारात आगे बढ़ी। भगवान विष्ण-मां लक्ष्मी का विवाह संपन्न हुआ।

बस तब देवतागगणों को भी सलाह दी कि किसी भी कार्य से पहले गणेश जी की पूजा की जाए और यही पौराणिक मान्यता अब तक जारी है। सभी शुभ कार्यों से पहले गणपति महाराज को याद करने का विधान यहीं से शुरू होता है। शादी समारोह के साथ-साथ सभी मंगल कार्यों के लिए

'विघ्न हरण मंगल करण,

श्री गणपति महाराज,

प्रथम निमंत्रण आपको,

मेरे पूरण करिये काज।।' 

इसके साथ गणेश जी को आमंत्रित किया जाता है। पूजा के दौरान भगवान गणेश के प्रिय मोदक का प्रसाद जरूर रखें। पीले वस्त्र धारण करें और उनकी सवारी मूषक राज की पूजा भी जरूर करें। गणेश जी की मूषक पर सवार प्रतिमा या चित्र पर पुष्प चढ़ावें और मंगलकामना करते हुए भगवान के आगे शीश झुकावें। 

Edited By: Shivam Bajpai