रामचरितमानस भारत का जीवंत संविधान! दैनिक जागरण विचार गोष्ठी में बोले प्रबुद्धजन; सनातन संस्कृति ही राष्ट्र का गौरव
भागलपुर में आयोजित विचार गोष्ठी में भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य और राष्ट्रवाद को राष्ट्र की आत्मा बताया गया। वक्ताओं ने ...और पढ़ें

दैनिक जागरण के भागलपुर कार्यालय में ‘भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य और राष्ट्रवाद’ विषयक विचार गोष्ठी में विचार व्यक्त करते प्रबुद्धजन व साहित्यकार
HighLights
भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य राष्ट्रवाद के मूल पूरक हैं।
रामचरितमानस भारत का जीवंत संविधान है, वक्ताओं ने कहा।
सनातन संस्कृति ही राष्ट्र का सच्चा गौरव और पहचान है।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य राष्ट्रवाद के मूल पूरक हैं। साहित्य का दर्पण ही किसी भी राष्ट्र की जीवंत सांस्कृतिक चेतना को प्रतिबिंबित करता है। लंबे कालखंड तक विदेशी आक्रांताओं के हमलों और औपनिवेशिक शासन के बावजूद भारतीय संस्कृति का वैभव निरंतर समृद्ध होता रहा, क्योंकि यही सांस्कृतिक चेतना हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान है। ये बातें बुधवार को दैनिक जागरण के भागलपुर कार्यालय में ‘भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य और राष्ट्रवाद’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने कहीं।
विचार गोष्ठी
आयोजक: दैनिक जागरण, भागलपुर।
विषय: 'भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य और राष्ट्रवाद'।
अध्यक्षता/विषय प्रवेश: संदीप कुमार (संपादकीय प्रभारी, दैनिक जागरण भागलपुर)।
विशेष घोषणा: पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन की जयंती पर नई दिल्ली में 'जागरण साहित्य सृजन सम्मान समारोह' का आयोजन।
प्रमुख सहभागी: डॉ. विजय कुमार वर्मा, डॉ. सुनीत, प्रो. डॉ. राजीव कुमार सिंह, संजय कुमार पासवान, प्रो. डॉ. आशा ओझा, योगी राजीव मिश्रा, आलोक राज, पूर्णेंदु चौधरी, चैतन्य प्रकाश, डॉ. अमृता कुमारी।
गोष्ठी का विषय प्रवेश कराते हुए दैनिक जागरण भागलपुर के संपादकीय प्रभारी संदीप कुमार ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना ही किसी राष्ट्र की जीवंतता का सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने इस अवसर पर साझा किया कि दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन की जयंती के उपलक्ष्य में नई दिल्ली में प्रतिष्ठित ‘जागरण साहित्य सृजन सम्मान समारोह’ का आयोजन किया जाएगा। इसके उपरांत गोष्ठी में उपस्थित प्रबुद्ध वक्ताओं, शिक्षाविदों और विचारकों ने विषय के विभिन्न आयामों पर अपनी विस्तृत राय रखी।
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1. डॉ. विजय कुमार वर्मा (प्रांतीय अधिकारी, विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी):
"राष्ट्र की आत्मा को समझना है तो स्वामी विवेकानंद के विचारों को गहराई से पढ़ना और आत्मसात करना होगा। पराधीन भारत की स्थिति से चिंतित होकर उन्होंने जनमानस में स्वाभिमान जगाने के लिए कहा था कि अगले 50 वर्षों तक सभी देवी-देवताओं को भूलकर सिर्फ भारत माता की पूजा करें, राष्ट्र अपने आप सशक्त हो जाएगा। स्वामी जी ने जात-पात मिटाने और सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहा था कि प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है, इसलिए भेदभाव त्यागें। भारत में बचपन का झूला, जवानी का उपवन और बुढ़ापे की काशी समाहित है। हमारी सनातन संस्कृति संपूर्ण विश्व में गौरवान्वित है।"
2. डॉ. सुनीत (चिंतक और चिकित्सक):
"जो व्यक्तित्व और चरित्र इतिहास की मुख्यधारा में होने चाहिए थे, जिनसे नई पीढ़ी के भीतर राष्ट्रीय स्वाभिमान जागता, उन्हें षड्यंत्रपूर्वक विस्मृत कर दिया गया। हमारी सांस्कृतिक पहचान को क्षति पहुंचाई गई। मोहम्मद गोरी को युद्ध में पराजित करने वाली पाटन की नायकी देवी, ईस्ट इंडिया कंपनी और पुर्तगालियों के छक्के छुड़ाने वाली रानी अब्बक्का, और डच सेना को धूल चटाने वाले राजा मार्तंड वर्मा जैसे महानायकों को आज इतिहास में उचित स्थान नहीं मिलता। जब हम अपने असली राष्ट्रीय गौरवों को भूलेंगे तो देश की आंतरिक शक्ति कैसे अक्षुण्ण रहेगी? यह धरा हमारी है और हम इसके हैं, यह भाव हर नागरिक में होना चाहिए।"
3. प्रो. डॉ. राजीव कुमार सिंह (रसायन विज्ञान विभाग, टीएनबी कॉलेज):
"भारत को जोड़ने वाला सबसे मजबूत सूत्र धर्म और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भौगोलिक और भाषाई विविधता के बावजूद देशभर के श्रद्धालु ज्योतिर्लिंगों और शक्तिपीठों में समान आस्था से नतमस्तक होते हैं। हमारे वैज्ञानिकों—आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे, डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का संपूर्ण जीवन राष्ट्रहित की वैज्ञानिक सोच का उदाहरण रहा। भगवान श्रीराम ने लंका विजय के बाद भी अयोध्या लौटकर 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का संदेश दिया। महाभारत और रामायण से हमें राष्ट्र निष्ठा सीखनी चाहिए।"
4. संजय कुमार पासवान (शिक्षाविद):
"बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए, जिसमें सनातन संस्कार, राष्ट्रभक्ति और गौरवशाली धरोहर का समावेश हो। जब तक हम नई पीढ़ी को उनके मूल कर्तव्यों का बोध नहीं कराएंगे, तब तक एक सशक्त समाज और समृद्ध राष्ट्र की कल्पना अधूरी रहेगी। हमें हनुमान जी जैसे निस्वार्थ समर्पण भाव को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। विविधतापूर्ण संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए अखंड भारत का निर्माण ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।"
5. प्रो. डॉ. आशा ओझा (हिंदी विभाग, एसएम कॉलेज):
"‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उद्घोष ही भारत का वैश्विक दृष्टिकोण है। गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस भारत का चलता-फिरता संविधान है। मानस की चौपाई 'सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति' स्पष्ट करती है कि भारत का चिंतन सदैव लोककल्याण और सौहार्द का रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जब तक कोई विदेशी ताकत हमारी विरासत पर मुहर नहीं लगाती, हम अपनी अमूल्य धरोहर का मूल्य नहीं पहचानते। हमें ऋषि परंपरा और अपने आध्यात्मिक गौरव को पुनर्जीवित करना होगा।"
6. योगी राजीव मिश्रा (योग शिक्षक):
"समाज में राष्ट्रीयता होनी चाहिए, किसी प्रकार का संकीर्ण वाद नहीं। हमें मिलकर एक मंत्र और एक राष्ट्रभाव का उद्घोष करना होगा। आज शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाने और स्वदेशी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। देश के उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों और तपस्वियों को खोजकर सामने लाएं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारत के लिए न्योछावर कर दिया। इसके साथ ही स्वदेशी खेलों और जीवनशैली को भी दैनिक जीवन में महत्व दिया जाए।"
7. आलोक राज (छात्र):
"ग्रामीण परिवेश की जो सामूहिक एकजुटता और अपनापन था, वह आधुनिकता की अंधी दौड़ में क्षीण हो रहा है। हमारी पारंपरिक जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण का आधार थी। जिस नीम और बबूल की दातुन को हमने पिछड़ा मानकर छोड़ दिया, आज पश्चिमी देश उसे डॉलर के भाव बेच रहे हैं। विदेशी हमारी संस्कृति, योग और विरासत को अपना रहे हैं और हम तुलसी के पौधों की जगह प्लास्टिक के सजावटी पौधे लगाने लगे हैं। हमें प्रकृति और परंपरा के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा।"
8. पूर्णेंदु चौधरी (कमिश्नरी रिसोर्स पर्सन, किलकारी व साहित्यकार):
"चुनौतियों के दौर में बच्चों की अभिव्यक्ति को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। बच्चों को बोलने का अवसर दें और उनकी बात ध्यान से सुनें; संवाद की कमी से बच्चे गलत दिशा में भटक जाते हैं। आज बच्चे अपने माता-पिता और स्थानीय मनीषियों के बजाय विदेशी साहित्यकारों और पश्चिमी संस्कृति से अधिक प्रभावित हो रहे हैं। विदेशी साहित्यकार भारतीय परिवेश को केंद्र में रखकर नहीं लिखते। जब तक हमारी नई पीढ़ी अपनी मिट्टी के रचनाकारों को नहीं पढ़ेगी, तब तक राष्ट्रीयता की नींव मजबूत नहीं हो सकती।"
9. चैतन्य प्रकाश (वरिष्ठ रंगकर्मी):
"स्वतंत्रता सेनानियों और बलिदानियों की भूमि की माटी को मस्तक पर लगाना अंधविश्वास नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। हमें आचार्य चाणक्य के कूटनीतिक चिंतन को याद रखना होगा। युवाओं को कश्मीर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव से परिचित कराएं, ताकि उसके प्रति भावनात्मक एकात्मता सुदृढ़ हो। विदेशी रचनाकारों के स्थान पर देशप्रेम से ओतप्रोत भारतीय साहित्य का अध्ययन कराया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन समय की मांग है।"
10. डॉ. अमृता कुमारी (शिक्षिका, प्लस टू स्कूल):
"भारत की विविधता में ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और एकता निहित है। हमें 'स्व' यानी अपनी मूल पहचान के प्रति सजग रहना होगा। अपनी स्थानीय भाषा पर कभी हीनभावना न पालें। अंग क्षेत्र के निवासी होने के नाते हमें अंगिका बोलने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जब भी हम राज्य या देश से बाहर जाएं, अपनी बोली, सभ्यता और लोककला को पूरे स्वाभिमान और आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने प्रस्तुत करें।"
दैनिक जागरण कार्यालय में आयोजित विचार गोष्ठी का मूल संदेश रहा कि साहित्य और संस्कृति ही राष्ट्रवाद की सच्ची आत्मा हैं। वक्ताओं ने इतिहास के उपेक्षित नायकों के स्मरण, स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रभाव को आत्मसात करने, रामचरितमानस के नैतिक मूल्यों और मातृभाषा के स्वाभिमान पर जोर दिया। नई पीढ़ी को सनातन संस्कारों से जोड़ना ही सशक्त भारत का आधार है।
