भागलपुर। शहर में अधिकाश तालाब और पोखर खत्म होते जा रहे हैं। बाकी जो बचे हैं उनके अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जलस्त्रोत को नियंत्रित रखने के आसान उपाय को हमने हाथ से निकल जाने दिया है। नतीजा यह है कि गर्मी के इस मौसम में जलस्तर 30 से 40 फीट नीचे चला गया है।

कभी शहर और इसके आसपास के क्षेत्रों में तालाब व पोखरों का जाल बिछा था। लेकिन हाल-फिलहाल यहा नए पाखर तो नहीं खोदे गए लेकिन पुराने पोखरों की भराई जरूर हो गई है।

जनसंख्या विस्फोट से समस्या गहराई

जनसंख्या विस्फोट एवं गाव छोड़कर शहर में बसने की प्रवृति के कारण नई-नई आवासीय कॉलोनियों का निर्माण हो रहा है। इसलिए शहर में भूखंड की कमी हो जाने के बाद भू-माफिया की निगाह तालाब व पोखरों पर जा टिकी। पिछले तीन दशकों में शहर के दो दर्जन से अधिक तालाबों को भरकर बसोवास की जमीन में परिवर्तित किया जा चुका है।

तब तालाब खुदवाना था स्टेटस सिंबल

बीते दिनों कोठी के साथ अतिरिक्त तालाब खुदवाना स्टेटस सिंबल माना जाता था। भागलपुर के उत्तरी हिस्से की तुलना में दक्षिणी खंड में तालाब व पोखरों की बहुलता है। शहर एवं इसके आसपास के 50 से अधिक पोखर थे। जानकारों का कहना है कि अब जितने भी बचे पोखर हैं सब के सब अंग्रेज जमाने के हैं। कई जगहों पर तो पुराने ईट-भट्ठे ने ही तालाब का रूप ले लिया है।

पहले भागलपुर में बंगाली समुदाय के लोगों की संख्या भी काफी थी। जिसके बारे में कहा जाता है कि वे मछली के शौकीन होते हैं। उनमें जो रईस थे, उन्होंने मत्स्य पालन के लिए तालाब खुदवाए। बुजुर्गो का कहना है कि जमींदारी काल में भागलपुर में भी तालाब व पोखर खुदवाए गए ताकि लोगों को सहजता से पानी की सुविधा उपलब्ध हो सके।

कालातर में पोखर हो गए उपेक्षा का शिकार

कुछ दशक पूर्व तक स्थानीय लोगों द्वारा इसका उपयोग स्नान सहित अन्य कार्यो के लिए किया जाता था। कालातर में पोखर उपेक्षा का शिकार हो गए और अब मछली पालन तक सीमित हो गया। लेकिन अब वह भी गंदगी व जलस्रोत में निरंतर हो रही कमी के कारण यह मानव उपयोग के लायक नहीं है।

पैसे की चाहत में तालाब-पोखरों को भर दिया गया

सर्वेक्षण के क्रम में यह बात सामने आई कि सिकंदरपुर के बरबिघ्घी में एक विशाल पोखर था, जिसे भरकर बेच दिया गया। हनुमाननगर में भी एक पोखर था अब उसके ऊपर मकानों की श्रृंखला है। सिकंदरपुर में ही लाल तालाब था, जिसे भरकर बेच दिया गया। क्लबगंज स्थित छत्रपति तालाब भी मिट्टी व कूड़ा भरकर बेच दिया गया। बागवाड़ी में दो पोखरों को भरकर आवासीय कॉलोनी में बदला जा चुका है। वारसलीगंज मोहल्ले में मस्जिद के बगल में कासिम परिवार का पोखर भी विलुप्त हो गया। यहीं एक अन्य पोखर था, जो अब नजर नहीं आता। शिवपुरी कॉलनी में साहु परबत्ता परिवार वालों का पोखर था, जिसे भरकर कई भवनों का निर्माण किया जा चुका है। गोलाघाट मोहल्ले में भी गढ़ैया पोखर को भर दिया गया। सरमसपुर में एक तालाब को भरकर एलआइसी कॉलनी का निर्माण किया जा चुका है। सुरखीकल कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया है। लालू चक, भीखनपुर स्थित तालाब भी अब समाप्त हो गए हैं। इसके अलावा शहर के बाकी बचे कई पोखरों व तालाबों पर भू-माफिया की नजर है। आश्चर्य नहीं कि वह भी जल्द ही आवासीय कॉलनी में परिणत हो जाए। तालाबों की अधोगति इस वजह से भी हो रही है कि वे सारे के सारे निजी मिल्कियत से हैं तथा पैसे की चाहत व मछली पालन में घाटा के मद्देनजर उसे बेच दिया गया या फिर बेचने की जुगत में हैं।

मछली पालन के प्रति बढ़ी उदासीनता :

मछली पालन करना अब अत्यंत जोखिम भरा हो गया है। अपराधी एवं दुष्ट प्रवृति के लोग चुपके से तालाब में जहर डालकर मछली की हत्या कर देते हैं, जिससे मछली पालन उद्योग को गहरा धक्का लगा है। मछलियों रखवाली करना इस आपराधिक युग में टेढ़ी खीर है। फलस्वरूप तालाबों की सफाई एवं रखरखाव की ओर लोगों का ध्यान हटता जा रहा है। यही वजह है कि तालाबों का पानी मानवोपयोग के लायक नहीं रह गया है। चापाकल एवं बो¨रग की सुविधा के कारण तालाब की उपयोगिता भी दिन प्रतिदिन घटती गई। सफाई के अभाव में घटते जलस्तर एवं तालाब के आसपास सिंचित भूमि के बसोवास जमीन में तब्दील हो जाने के कारण अब इसकी उपयोगिता केवल जानवरों के स्नान कराने के लिए बच गई है।

शहर में यहां थे तालाब :

कुतुबगंज स्थित महादेव तालाब, लीलझी पोखर, अक्को पोखर, चमरटोली व कागजी टोला लेन का पोखर, वनकट्टा में तीन पोखर, बागवाड़ी का लाट पोखर, सकरुल्लाचक स्थित पोखर, मुगलपुर का घोबघट्टा पोखर, हुसैनाबाद का मिर्जा तालाब, बंदू मोदी लेन का पोखर, रामनाथ सिंह लेन का पोखर, वृंदावन कॉलनी लेन का पोखर, अलीगंज का बूढ़ी पोखर, मारूफगंज का पोखर, अंबई स्थित दो पोखर, मौलानाचक में जहूर अली का पोखर, काजीचक लेन स्थित पोखर, गनीचक में तिवारी तालाब, अलीगंज में लाडली पोखर, मानिकपुर स्थित पोखर। इसमें से कुछ गायब हो गए तो कुछ अंतिम सासें गिन रहा है। इसके अलावा शाहजंगी में भी बड़ा तालाब है जो लोगों की जागरुकता से फिलहाल अच्छी स्थिति में है।

तालाब, झील, पोखर भूजल के पुनर्भरन का जरिया

तालाब, झील, पोखर, आहर, नाहर, गड्ढे ये सभी भूजल के पुनर्भरन का जरिया हैं। तालाब को पृथ्वी का रोम कूप भी कहते हैं। नदियों के किनारे भी कुआं बनाए जाते थे। धीरे-धीरे सभी तालाब, पोखर और कुंओं को भर दिया गया। शहर में तो तालाबों को भरकर अट्टालिकाएं खड़ी कर दी गई। अब भूजल का स्तर काफी नीचे जा चुका है। इसे वापस लाना है तो तालाबों को जिंदा करना होगा। सरकारी तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराने की जरूरत है। भविष्य में जल संकट की स्थिति को देखते हुए सभी को जागरूक होने और अपने साथ वालों जागरूक करने की जरूरत है।

तालाब बाढ़ के कहर को भी नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। तालाबों का अब का हश्र भविष्य के लिए भयावह है। केंद्र सरकार ने 2010 में जलाशयों के संरक्षण के लिए नियम बनाए, जिसके तहत सरकारी और निजी दोनों किस्म के तालाबों, पोखरों, झीलों के संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई। इस कानून के पाच साल बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दबाव में राज्यों ने राज्य जलाशय प्राधिकरण का गठन किया। बिहार में प्राधिकरण ने तय कि शहरी क्षेत्र के हर प्रकार के छोटे-बड़े जलाशयों को इस दायरे में लाया जाएगा और शहर से बाहर के इलाकों में सौ हेक्टेयर वाले जलाशयों को। इतना तय करने के बाद प्राधिकरण ने अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली। शहर में तालाब भरे जाते रहे, प्राधिकरण मौन है। निजी स्तर से सरकार से कई दफे पत्राचार किया गया, पर सक्षम लोग कान में तेल डालकर सोए हुए हैं। अब इन्हें जगाने के लिए फिर से न्यायालय का शरण लेना होगा। जनहित याचिका दायर करनी होगी। रालेगण सिद्धि और गुजरात में तालाबों की संख्या बढ़ी तो वहा का पानी का लेयर बढ़ गया। कभी पानी से लबालब रहने वाले लातूर में जल संकट से निदान के लिए रेलगाड़ी से पानी भेजा गया। यह हमें बता रहा है कि हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा।

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कोट तालाबों का खत्म होना मानव के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। इन तालाबों में मेढकों की प्रजननशीलता बढ़ती थी, जो पर्यावरण के लिए हितकारी माना जाता था। पर्यावरण संबर्धन के ख्याल से तालाब व पोखरों का संरक्षण आवश्यक है।

-प्रो.फारुक अली, प्रतिकुलपति

बीएन मंडल विवि

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हड़प्पा और मोहन जोदड़ो काल के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि तालाबों और अन्य जलाशयों का कितना महत्व था। तब के लोग भावी पीढ़ी के प्रति कितने सचेत थे। अब जबकि हम अधिक जानकार माने जा रहे हैं तो लोग जानबूझकर पैसे के लोभ में लोग भविष्य और आने वाली पीढ़ी के लिए संकट पैदा कर रहे हैं। इनकी सोच बन गई कि पानी के लिए गरीब मरेंगे तो मरेंगे, हमारे पास पैसा होगा तो हजार फीट का बोरिंग भी करके पानी निकाल लेंगे। उतने नीचे से गैस निकल आती है, पानी नहीं मिलेगा। सभी को जागरूक होकर तालाबों के संरक्षण और उसे बचाने की जरूरत है।

प्रो. एसएन पांडेय, पूर्व विभागाध्यक्ष

पीजी भूगोल विभाग

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भूमाफिया का साफ्ट टारगेट तालाब बने हुए हैं। इनपर लगाम कसना ही होगा। शहर के कई महत्वपूर्ण पोखर समाप्त हो गए। इसके लिए सख्त कानून की आवश्यकता है। बिलकुल शराबबंदी की तर्ज पर सरकार को इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है। तालाबों का संरक्षण शराबबंदी से कम जरूरी मामला नहीं है। समाज के लोगों को भी जागरूक होना होगा।

रमण कर्ण, सलाहकार, नागरिक विकास समिति

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Posted By: Jagran

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