भागलपुर [नवनीत मिश्र]। दीपावली के बाद शहर में वायु प्रदूषण बहुत अधिक बढ़ चुका है और आने वाले कुछ दिनों तक इसका प्रभाव बना रहेगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पटना ने प्रदूषण में 20 फीसद तक इजाफा बताया है।

शहर की आबोहवा में रीस्पाइरेबल सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) बढ़ गया है। इससे फेफड़े पर कुप्रभाव पड़ता है। लोग श्वांस समस्या, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, डिप्रेशन, बेचैनी जैसी बीमारियों के भी शिकार हो रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक आरएसपीएम का वार्षिक औसत 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली के बाद इसमें 20 फीसद तक की वृद्धि हुई है। वहीं, ध्वनि के स्तर में भी 15 डेसीबल की बढ़ोत्तरी हुई है।

इको फ्रेंडली नहीं रहा वातावरण

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अध्ययन केंद्र के प्रधान अन्वेक्षक रहे प्रो. पांडेय ने कहा कि वनस्पति में कार्बन के आकलन के अध्ययन के लिए इसरो ने पांच वर्ष पूर्व तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का चयन किया था। विवि ने इस पर बिहार और झारखंड में अध्ययन किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि भागलपुर में वातावरण इको फ्रेंडली था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। प्रदूषण दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है और खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। यह अध्ययन इसरो के अंतर्गत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग की ओर से भारत में नेशनल कार्बन प्रोजेक्ट प्रोग्राम के तहत कराया गया था।

अगले कुछ दिनों तक दिखेगा असर

वायु प्रदूषण का असर शहर में अगले कुछ दिनों तक दिखेगा। पीजी रसायन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. ज्योतिन्द्र चौधरी ने कहा कि रात में की गई आतिशबाजी से निकले धुएं की एक परत वायुमंडल में बन जाती है। यह परत कई दिनों तक बनी रहती है। वातावरण में में 20 फीसद तक ऑक्सीजन की मात्रा रहनी चाहिए। यह मात्रा 20 से घटकर 17 फीसद रह गई है। वहीं, हवा में इसका दाब भी 0.2 फीसद तक घट गया है।

सांस लेने लायक नहीं है हवा

वातावरण में मौजूद पीएम-2.5 के कण का प्रतिशत भागलपुर में 62.5 तक पहुंच गया है, जो सामान्य से अधिक है। पीएम-2.5 के कण के बढऩे का कारण, हरियाली की कमी, ठीक से सफाई नहीं होना, कचरा जलाया जाना आदि है। वहीं, उत्तर-पूर्व राज्यों को जोडऩे वाली सड़क पर हर दिन सैकड़ों गाडिय़ों के आवागमन से भी इसमें बढ़ोत्तरी हुई है।

पटाखे जलाने से सबसे अधिक प्रदूषण

पीजी रसायन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि पटाखे जलाने से सबसे अधिक प्रदूषण बढ़ा है। इससे कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फ्यूरिक नाइट्रिक व कार्बनिक एसिड जैसी जहरीली गैस वायुमंडल में फैलती है। इससे कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पेड़-पौधों के जलने व जलस्रोत के दूषित होने से जलीय जीवों पर असर पड़ता है।

क्षारीय हो रही भूमिगत जल की प्रकृति

शहरी क्षेत्र में भूमिगत जल की प्रकृति तेजी से बदल रही है। पेयजल की गुणवत्ता सात पीएच मान से अधिक, यानी क्षारीय हो चुकी है। यह खतरनाक है। पानी का पीएच मान सात होना चाहिए। सात से अधिक होने पर यह अम्लीय हो जाता है। जबकि, सात से अधिक होने पर क्षारीय हो जाता है।

कंक्रीट के जंगल किए जा रहे तैयार

टीएमबीयू के भूगोल विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एसएन पांडेय ने कहा कि अब भागलपुर की आबोहवा इको फ्रेंडली नहीं रही। एक जमाना था जब बाहर से लोग यहां छूट्टियां बिताने आते थे। पेड़-पौधे को काट कर यहां कंक्रीट के जंगल तैयार किए जा रहे हैं।

वायु प्रदूषण से कैंसर का खतरा

वायु प्रदूषण के कारण बच्चे से लेकर वयस्क तक कई बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। इसके अलावा फेफड़े के कैंसर की भी संभावना बनी रहती है। श्वास व हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आलोक कुमार सिंह के मुताबिक कार्बन डायऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड और सल्फर ऑक्साइड स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक खतरनाक है। बच्चे व गर्भवती महिलाओं पर भी इसका असर पड़ रहा है। धूल से एलर्जी होने पर गले में खरास के अलावा लगातार छींक आने लगती है। नाक से पानी गिरने लगता है। वायु प्रदूषण से फेफड़ा के कैंसर के अलावा अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है।

गर्भवती महिलाओं पर असर

-शारीरिक दुर्बलता : गर्भवती महिला के शरीर का सही तरह से विकास नहीं हो पाता है।

-सयम पूर्व प्रसव : बच्चे का जन्म तय तिथि से पहले हो सकता है।

-हृदय पर प्रभाव : गर्भस्थ शिशु के हृदय या हृदय के निकट की हृदयवाहानियों का सामान्य विकास नहीं हो पाता है।

-शारीरिक विकास पर असर : बच्चे के अंगों का संपूर्ण विकास नहीं हो पाता है, सामान्य प्रसव में भी हो सकती है परेशानी।

बच्चों में परेशानी

-कफ-बलगम निकलना

-आखों में पानी आना, लाल होना

-कान में खुजली होना, छूने पर दर्द होना

-फेफड़े की समस्या

-गले में दर्द

शहरी क्षेत्र में पांच प्रतिशत भी नहीं है वन

पर्यावरणविद डॉ. केडी प्रभात ने कहा कि वायु प्रदूषण की वजह से ही कोहरा घना होता है। इससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है। पर्यावरण संतुलन के लिए 33 फीसद वन होना जरूरी है, लेकिन शहरी क्षेत्र में यहां पांच फीसद भी वन क्षेत्र नहीं है।

बढ़े टीवी के मरीज

वर्ष           टीवी के मरीज     जांच

2015       2367                18869

2016       2322                18927

2017       2141                14636

2018       2850                19900

Posted By: Dilip Shukla

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