भागलपुर [कौशल किशोर मिश्र]। 1979 से 1980 के बीच हुए अंखफोड़वा कांड के 18 पीडि़तों का पेंशन बंद हो गया है। नवंबर 2019 से उन्हें बैंक से दी जाने वाली पेंशन राशि नहीं दी गई है। पीडि़तों ने अधिवक्ता रामकुमार मिश्रा के जरिये डीएम प्रणव कुमार को इसकी जानकारी दी और आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया।

अंखफोड़वा कांड के जिंदा बचे पीडि़तों में उमेश यादव, भोला चौधरी, पटेल साह, मंटू हरि, पवन कुमार सिंह, सहदेव दास, शंकर तांती, शैलेश तांती, वसीम मियां, चमक लाल यादव, सल्लो बेलदार, कमल तांती, लखन मंडल, सुरेश साह, शालीग्राम साह, रमण बिंद और उमेश यादव शामिल हैं। डीएम को दिए गए पत्र में अधिवक्ता ने बताया है कि पीडि़तों की ओर से 1980 में सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की थी। न्यायालय ने उन्हें पेंशन देने का आदेश दिया था। वर्तमान में 750 रुपये पेंशन पीडि़तों को दी जा रही है।

न्यायालय के आदेश पर हर पीडि़त के लिए 30-30 हजार रुपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जमा कराए गए थे। उस राशि के ब्याज के रूप में हर माह पीडि़तों को पेंशन दिया जा रहा था। पीडि़तों ने पेंशन को लगातार करने के लिए डीएम से आवश्यक कदम उठाने की मांग की है।

पुलिसकर्मियों ने 33 लोगों की आंखें फोड़ डाल दी थी तेजाब

अंखफोड़वा कांड में पुलिस आरोपितों को पकड़कर थाने ले आई थी। यहां उनकी आंखें टकुए से फोड़ कर उनमें तेजाब डाल दी गई थी। 33 लोगों की आंखें फोड़ी गई थी जिनमें कई तो निर्दोष थे। पीडि़तों को हक दिलाने को जनहित याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता रामकुमार मिश्रा के अनुसार इनमें 15 पुलिस पदाधिकारियों को आरोपित बनाया गया था। 14 ने गिरफ्तारी आदेश जारी होने पर अदालत में आत्मसमर्पण किया था, जिन्हें सजा भी मिली।

Posted By: Dilip Shukla

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