अंगभूमि का 'केलांचल' नवगछिया; गंगा-कोसी के कछार में तैयार है 'पीला सोना', छठ में दिल्ली-UP समेत 6 राज्यों तक मांग
Bhagalpur Naugachia Banana Farming: बिहार के भागलपुर जिले का नवगछिया क्षेत्र, जिसे 'केलांचल' कहा जाता है, गंगा-कोसी की उपजाऊ मिट्टी ...और पढ़ें

Bhagalpur Naugachia Banana Farming: बाढ़ और आंधी के थपेड़ों के बीच खिलता नवगछिया का केलांचल
HighLights
नवगछिया 'केलांचल' के नाम से प्रसिद्ध, हजारों किसानों की आजीविका।
गंगा-कोसी की उपजाऊ मिट्टी में केले की व्यापक खेती, राष्ट्रीय आपूर्ति।
छठ पर्व में केले का विशेष महत्व, प्रसंस्करण इकाइयों की आवश्यकता।
डिजिटल डेस्क, भागलपुर। Bhagalpur Naugachia Banana Farming:बिहार की पावन धरती अपनी समृद्ध कृषि परंपरा, लोकआस्था और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए विख्यात है। इसी कृषि गौरव का सबसे सशक्त अध्याय लिख रहा है भागलपुर जिले का नवगछिया अनुमंडल। गंगा और कोसी नदियों के कछार में फैला यह इलाका आज केवल एक सामान्य कृषि क्षेत्र नहीं, बल्कि हजारों किसान परिवारों की आजीविका की रीढ़ और समूचे बिहार की आर्थिक पहचान बन चुका है।
अपनी व्यापक पैदावार और मीठे स्वाद के कारण इस पूरे इलाके को आम बोलचाल में ‘केलांचल’ के नाम से जाना जाता है। खरीक, नवगछिया, गोपालपुर, इस्माईलपुर, रंगरा और बिहपुर प्रखंडों में जिधर भी नजर दौड़ाइए, मीलों तक लहलहाते केले के बागान इस क्षेत्र की असीम कृषि क्षमता की कहानी बयां करते हैं।
यहां का उत्पादित केला न केवल स्थानीय और प्रांतीय बाजारों की मांग पूरी करता है, बल्कि ट्रकों और ट्रेनों के जरिए झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और मध्य प्रदेश की थोक मंडियों तक अपनी धमक बनाए हुए है।
गंगा-कोसी की मिट्टी और किसान का अटूट रिश्ता
गंगा और कोसी की बाढ़ अपने साथ जो सिल्ट (बारीक जलोढ़ मिट्टी) लेकर आती है, वह केले के पौधों के लिए प्राकृतिक उर्वरक का काम करती है। क्षेत्र का समशीतोष्ण तापमान और पर्याप्त नमी केले की व्यावसायिक बागवानी के लिए आदर्श वातावरण तैयार करते हैं। हालांकि, यह सफर चुनौतियों से मुक्त नहीं है।
हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़, जलजमाव और आंधी-तूफान कई बार तैयार खड़ी फसलों को तबाह कर देते हैं। इसके बावजूद किसान पीढ़ियों के पारंपरिक तजुर्बे और आधुनिक जल निकासी व स्टेकिंग (पौधों को बांस का सहारा देना) तकनीकों के दम पर इस 'पीले सोने' की खेती को लगातार विस्तार दे रहे हैं।
11 से 17 महीने की अनवरत साधना, तैयार होता है संसार
केले की खेती धैर्य और निरंतर निगरानी की मांग करती है। खरीक के तुलसीपुर, ध्रुवगंज, गोट खरीक और तेलघी जैसे गांवों के किसान खेत की तैयारी से लेकर जैविक खाद, संतुलित पोषण और कीट प्रबंधन में महीनों पसीना बहाते हैं।
सामान्य सकर (जड़ के पौधे) से फसल तैयार होने में करीब 16 से 17 महीने का वक्त लगता है। वहीं, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर द्वारा अनुशंसित टिश्यू कल्चर पद्धति से तैयार चिनिया व जी-9 पौधों में यह फसल 13 से 15 महीने में कटाई के योग्य हो जाती है। यह पूरी व्यवस्था पौध नर्सरी से लेकर कटाई, छंटाई, ढुलाई और परिवहन तक स्थानीय स्तर पर लाखों मानव दिवस का रोजगार सृजित करती है।
[सब-हेडिंग: सिंगापुरी, मालभोग से लेकर जी-9 तक का दबदबा]
नवगछिया के बागानों में बाजार की नब्ज के हिसाब से किस्में उगाई जाती हैं:
मालभोग: अपनी भीनी खुशबू, उत्कृष्ट मिठास और पूजा-पाठ में अनिवार्य उपयोग के कारण यह किस्म सबसे अधिक प्रीमियम मानी जाती है।
चिनिया: छोटे आकार का यह केला अपने खास स्वाद और सुपाच्यता के लिए घरेलू स्तर पर खूब पसंद किया जाता है।
सिंगापुरी व कावेन्डिश: लंबे फल और मोटी त्वचा के कारण लंबी दूरी के परिवहन में खराब नहीं होते, इसलिए दूसरे राज्यों के व्यापारियों की पहली पसंद हैं।
ग्रैंड नैन (G-9): टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार यह किस्म एक समान फल और भारी घौद (बंच) के कारण किसानों को अधिकतम मुनाफा देती है।
हाजीपुर का ऐतिहासिक नाम, नवगछिया का व्यावसायिक परचम
बिहार में केले के परिदृश्य पर नजर डालें तो वैशाली के हाजीपुर का चिनिया केला अपनी ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान के लिए जाना जाता है। वहीं, भागलपुर का नवगछिया क्षेत्र बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन और अंतरराज्यीय व्यापार के मामले में सिरमौर है। हाजीपुर और नवगछिया मिलकर बिहार की फलोत्पादन क्षमता को राष्ट्रीय पटल पर मजबूती से स्थापित करते हैं।
लोकआस्था के महापर्व छठ में केले का पवित्र महत्व
सूर्य उपासना के महापर्व छठ में केला महज एक फल नहीं, बल्कि प्रकृति, पवित्रता और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। भगवान भास्कर और छठी मइया को अर्घ्य दान करते समय पूजा के सूप और दौरा में साबुत केले का घौद अर्पित करने की अटूट परंपरा है।
छठ के दिनों में नवगछिया का पूरा बाजार 'केलामय' हो जाता है। किसान जब खेतों से काटकर घौद मंडियों में लाते हैं, तो उनका यह कठिन परिश्रम सीधे लोकआस्था और घर-घर के अनुष्ठान से जुड़ जाता है।
चुनौतियां और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की दरकार
विशाल उत्पादन के बावजूद केलांचल के किसान अभी भी कई मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। अक्सर आंधी और स्थानीय बिचौलियों (आढ़तियों) के सिंडिकेट के चलते किसानों को फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता।
क्षेत्र के किसानों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नवगछिया में आधुनिक वातानुकूलित स्टोरेज, टर्मिनल फ्रूट मार्केट और केले से चिप्स, आटा तथा तने से प्राकृतिक रेशा (फाइबर) बनाने वाली प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित की जाएं, तो किसानों की आमदनी दोगुनी हो सकती है। उद्यान विभाग की फल विकास योजनाओं और सबौर कृषि विश्वविद्यालय के तकनीकी मार्गदर्शन से अगर इस क्षेत्र को संस्थागत मदद मिले, तो अंगभूमि का यह 'पीला सोना' राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है।
