मुगलकाल के मोइद्दीनचक की अनसुनी दास्तान, 400 साल में बदल गए चेहरे, पर नहीं बदली भागलपुर के मुंदीचक की पहचान
Bhagalpur Mundichak History: भागलपुर का मुंदीचक मोहल्ला 400 साल पुराने व्यापारिक और सामाजिक इतिहास का जीवंत प्रमाण है। कभी 'मोइद्दीनचक' ...और पढ़ें

Bhagalpur Mundichak History: मोइद्दीनचक से मुंदीचक बनने का 400 साल का सफर; कभी कचरे का ढेर था मिनी मार्केट, अब रोज ₹7 लाख का कारोबार
HighLights
मुंदीचक, भागलपुर का 400 साल पुराना व्यापारिक और सामाजिक केंद्र।
मूल नाम 'मोइद्दीनचक' से बदलकर बना वर्तमान 'मुंदीचक'।
कभी कचरा डंप रहा 'गढ़ैया' अब ₹7 लाख का थोक बाजार।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। Bhagalpur Mundichak History: शहर के मुख्य बाजार से सटा मुंदीचक केवल एक रिहायशी बस्ती नहीं, बल्कि बदलते भागलपुर के चार सौ साल के व्यापारिक और सामाजिक इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। वक्त का पहिया तेजी से घूमा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चेहरे बदले और पुराने खपरैल-मिट्टी के मकानों की जगह कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतों ने ले ली, लेकिन इस ऐतिहासिक मोहल्ले की संकरी गलियों ने अपनी मूल तासीर और रूह को नहीं खोया है। इन दीवारों और रास्तों के बीच सदियों पुरानी यादें आज भी सांस लेती हैं।
इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, मुगलकाल और ब्रिटिश शासन के दौर में जब दूर-दराज के इलाकों से सौदागर और व्यापारी भागलपुर पहुंचते थे, तो उनका प्रमुख ठिकाना यही मोहल्ला हुआ करता था। उस समय इसे 'मोइद्दीनचक' के नाम से जाना जाता था। समय बीतने के साथ बोलचाल के अपभ्रंश के चलते मोइद्दीनचक धीरे-धीरे 'मुंदीचक' के रूप में विख्यात हो गया। मुख्य बाजार से नजदीकी और व्यापारियों की नियमित आवाजाही के कारण यह इलाका धीरे-धीरे व्यावसायिक परिवारों का सबसे बड़ा केंद्र बनता चला गया।
मुगलकाल और अंग्रेजी हुकूमत में भागलपुर आने वाले बाहरी व्यापारियों का मुख्य ठिकाना था मुंदीचक मोहल्ला
मूल नाम 'मोइद्दीनचक' का अपभ्रंश होकर बना मुंदीचक; 400 वर्षों के बाद भी संकरी गलियों ने सहेज रखी है ऐतिहासिक पहचान
एक किलोमीटर के दायरे में 500 से बढ़कर 5,000 हुई आबादी; भीखनपुर, पटल बाबू रोड और रेलवे यार्ड से घिरा है इलाका
वर्ष 1969 में छोटी दुकानों से शुरू हुआ मिनी मार्केट; कभी 'गढ़ैया' (कचरा डंप) था, अब रोजाना 5 से 7 लाख का थोक कारोबार
स्थानीय निवासी दीपक कुमार बताते हैं कि मोहल्ले में मकानों की बनावट भले ही आधुनिक हो गई हो, लेकिन गलियों का खाका चार शताब्दियों पुराना ही है। पहले जिन गलियों में महज 500 लोगों की रिहाइश थी, आज उसी सीमित एक किलोमीटर के दायरे में लगभग 5,000 की घनी आबादी बस चुकी है। भौगोलिक दृष्टिकोण से यह मोहल्ला पूरब में भीखनपुर, पश्चिम में पटल बाबू रोड, उत्तर में सदर अस्पताल और दक्षिण में रेलवे यार्ड व रेलवे क्वार्टर से घिरा हुआ है।
सामाजिक समरसता की मिसाल और स्वर्णकारों का गढ़
मुंदीचक की पहचान सिर्फ नफा-नुकसान और व्यापार तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सामाजिक समरसता और साझा संस्कृति की भी अनूठी मिसाल रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले यहां मुस्लिम परिवार भी बड़ी संख्या में साथ रहते थे। समय के साथ उनकी संख्या कम हुई और अब कुछ ही परिवार शेष रह गए हैं, लेकिन आपसी भाईचारे की मिठास आज भी कायम है। यहां काली पूजा और दुर्गा पूजा पूरे मोहल्ले के सहयोग से भव्य रूप में मनाई जाती है। इसके अलावा, दशकों से यहां पारंपरिक स्वर्णकार परिवार बसे हुए हैं, जिनकी आभूषण निर्माण व बिक्री की दुकानें आज भी इस मोहल्ले की विशिष्ट पहचान बनी हुई हैं।
कभी 'गढ़ैया' में डंप होता था कचरा, आज रोजाना ₹7 लाख का टर्नओवर
मुंदीचक का मिनी मार्केट वर्तमान में भागलपुर शहर में आलू, प्याज, हरी सब्जियों, मौसमी फलों और मछली के सबसे बड़े थोक केंद्रों में शुमार है। हालांकि इसका आर्थिक उत्थान बेहद दिलचस्प रहा है। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक शंकर प्रसाद साह और बलराम पासवान बताते हैं कि जिस जगह आज सुबह से शाम तक बाजार गुलजार रहता है, 1960 के दशक तक वह एक निचला गड्ढा था जिसे लोग 'गढ़ैया' कहते थे और वहां शहर भर का कचरा फेंका जाता था।
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वर्ष 1969 में इस वीरान स्थान पर छोटी-छोटी किराना दुकानों के साथ व्यापार की पहली शुरुआत हुई। इसके बाद वर्ष 1984 से बाजार ने तेजी पकड़नी शुरू की और आलू, प्याज, मछली व तरबूज की बड़ी आढ़त लगने लगी। देखते ही देखते यह जगह थोक कारोबार का प्रमुख गढ़ बन गई। आज इस मिनी मार्केट में करीब 100 व्यापारी नियमित कारोबार कर रहे हैं, जहां रोजाना भोर होते ही पांच से सात लाख रुपये के कच्चे माल की थोक खरीद-बिक्री होती है।
