आनलाइन डेस्‍क, भागलपुर। नहीं हुआ है अभी सवेरा..., पूरब की लाली पहचान! चिडि़या के जगने से पहले... खाट छोड़ उठ गया किसान!! दशकों पहले किसानों के लिए लिखी गई यह कविता आज भी उतनी ही प्रसांगिक है। कुछ भी नहीं बदला हैं। ना किसान और ना ही उनकी दिनचर्या। लेक‍िन इसके बाद भी किसानों की माली हालत में सुधार नहीं हो रहा है। दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण तकनीक है। किसान अब तकनीक से कोसों दूर हैं। अगर वे तकनीक से दोस्‍ती कर ले तो उनकी आमदनी बढ़नी तय है। इस वाक्‍या की सत्‍यता को जानना-समझना हो तो आइए मिलते हैं बिहार के A टू Z क‍िसान रूपेश चौधरी से...!

(उपरामा में पराली प्रबंधन तकनीक के बारे में जानकारी लेते बांका डीएम सुहर्ष भगत)

42 वर्षीय रूपेश चौधरी मूलरूप से बांका जिले के उपरामा गांव के रहने वाले हैं। तकनीकि दक्षता के साथ-साथ पर्यावरण और प्रदूषण के बीच इन्‍होंने गजब का समन्‍वय स्‍थापित कर रखा है। वाटर हार्वेस्‍ट‍िंंग, पराली प्रबंधन, बायोगैस, सोलर इनर्जी, जमीन विवाद का निपटारा, बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली, मौसम अनुकूल खेती, कृष‍ि यंत्र बैंक जैसे कई आयामों पर ये एक साथ काम कर रहे हैं। इसके अलावा आसपास के गांवों के किसानों को नई तकनीकि के बारे में अवगत कराना भी इसकी दिनचर्या में शामिल है।   

मौसम अनुकूल खेती 

बांका जिले के उपरामा और आसपास के पांच गांवों में बि‍हार कृष‍ि विवि की देखरेख में मौसम अनुकूल खेती हो रही है। इस योजना को सही रूप से धरातल पर उतारने में रूपेश चौधरी का उल्‍लेखनीय योगदान रहा है। यही कारण है कि आज आसपास के अन्‍य गांवों के किसान भी अब खुद के खर्चे पर मौसम अनुकूल खेती को अपनाने लगे हैं। 

(जलवायु अनुकूल खेती के बारे में जानकारी देते रूपेश चौधरी, साथ में केविके के विज्ञानी)

अपने पैसे से स्‍थाप‍ित की कृष‍ि यंत्र बैंक 

रूपेश चौधरी ने खुद के पैसे से उपरामा गांव में कृष‍ि यंत्र बैंक स्‍थापित किया है। इससे आसपास के किसानों को वह सस्‍ते दर पर कृष‍ि यंत्र उपलब्‍ध कराते हैं। रूपेश चौधरी बताते हैं कि मौसम अनुकूल खेती में उपयोग किए जाने वाले जीरो ट‍िलेज, हैप्‍पी सीडर, लेजर लैंड लेवलर, स्‍ट्राव बेलर, कंबाइड हार्वेस्‍टर आदि कृष‍ि यंत्र किसानों को सस्‍ते दर पर किराए पर उपलब्‍ध कराया जाता है। 

गोबर से लेकर वर्षा जल तक का उपयोग 

रूपशे चौधरी घरेलू कार्यों के लिए परंपरागत ऊर्जा श्रोतों का उपयोग कर रहे हैं। इसके लिए उन्‍होंने घर पर बायोगैस प्‍लांट आदि बनवा रखा है। इसके अलावा उर्जा के लिए सोलर प्‍लांट का उपयोग कर रहे हैं। साथ ही वर्षा जल संरक्षण के लिए रैन वाटर हार्वेस्‍टिंग सिस्‍टम बनवाया है। 

 

(अपने छत पर लगाए गए सोलर प्‍लेट को दिखाते रूपेश चौधरी)

नि:शुल्‍क करते हैं भूमि‍ विवादों का निपटारा 

खेती-किसानी के साथ-साथ रूपेश चौधरी जमीन के बारे में भी गहरी पकड़ रखते हैं। यही कारण है कि वह आसपास के गांवों के किसानों का भूमि विवादों का निपटारा भी करते हैं। इसके बदले में वह किसी तरह का शुल्‍क नहीं लेते हैं। उन्‍होंने केवल अपने गांवा के चार सौ से अधिक भूमि विवाद का निपटारा किया है। 

नई पौध को खेती-किसानी से अवगत कराना

रूपेश चौधरी ने नई पौध को खेती-किसानी की बारिकियों से अवगत कराने का बीड़ा भी उठा रखा है। इसके लिए वे स्‍कूली बच्‍चों को खेती किसानी के बारे में श‍िक्षि‍त करते हैं। साथ ही आसपास के गांवों के किसानों को केंद्र और राज्‍य सरकार की नई योजनाओं के बारे में भी अवगत कराते हैं। 

कृष‍ि के लिए आधारभूत संरचना पर जोर

कृष‍ि कार्य के लिए आधारभूत संरचना के विकास के लिए भी रूपेश चौधरी लगातार काम कर रहे हैं। यही कारण है कि आज उपरामा और आसपास के गांवों में कृष‍ि कार्य के लिए रोड, ब‍िजली, पानी आदि की व्‍यवस्‍था है। खेतों तक रोड के बन जाने से किसानों को कृषि कार्य हेतु हार्वेस्टर, ट्रैक्टर या अन्य मशीनों को ले जाने में सुव‍िधा होती है। इसके लिए उनलोगों ने अनुपयोगी जमीन, जैसे बांध आदि का उपयोग करते हुए रोड का निर्माण कराया। आज यहां तीन किमी से ज्‍यादा सड़कों का निर्माण खुद के खर्च से कराया जा सका है। इससे कृष‍ि यांत्र‍िकरण को लाभ मिल रहा है। 

बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली

पानी की महत्‍ता को देखते हुए सरकार बंदू-बूंद सिंचाई प्रणाली यानी ड्रीप सिंचाई प्रणाली और मिनी स्‍प्रींकलर प्रणाली को प्रोत्‍साहित किया है। इस पर सरकार की ओर से 90 फीसद तक अनुदान भी दिया जा रहा है। उपरामा गांव के कई किसानों ने इसे अपने खेतों में लगाया है। 

जुगाड़ तकनीक से बनाया पंप लाकर 

खेतों तक बिजली पहुंच जाने के बाद क‍िसानों ने सरसेबल लगा दिया, लेकिन इसके बाद भी किसानों की समस्‍या दूर नहीं हुई। समरसेबल की लगातार चोरी होने लगी। इसको देखते हुए रूपेश चौधरी ने जुगाड़ तकनीक से मिनी पंप हाउस का निर्माण किया। इसकी कीमत तकरीबन सात हजार रुपये आती है। आसपास के लगभग सारे गांव के किसान रूपेश चौधरी द्वारा बनाए गए मिनी पंप हाउस के माडल को अपना रहे हैं। इससे समरसेबल की चोरी पर भी रोक लग गई है। 

प्रदूषण मुक्त थ्रेसर एक बेहतर विकल्‍प

आमतौर पर गांव-घरों में थ्रेसर चलने पर आसपास धूल ही धूल नजर आता है। लेकिन इन्‍होंने धूल मुक्‍त थ्रेसर तैयार किया है। इससे थ्रेसर से निकलने वाले भूसे को किसान सीधे आने गोदाम में स्‍टोर कर सकते हैं। इसके लिए गोदाम और थ्रेसर के बीच एक पाइप को जोड़ना पड़ता है। जिसकी कीमत औसतन दो हजार रुपये से पांच हजार रुपये तक आती है। इसके बाद यह इको फ्रेंडली हो जाता है। 

लो कास्‍ट सीड ग्रेडिंग मशीन

जहां एक और बीज की छटाई एवं सफाई के लिए लाखों रुपए की मशीन आती है, वहीं पर यह मशीन बहुत ही कम कीमत यानी लगभग 10 से 12 हजार रुपये में तैयार की जा सकती है। इससे धान गेहूं इत्यादि के बीजों की सफाई और छंटाई का कार्य आसान हो जाता है। यह बिजली चालित मोटर एवं डीजल इंजन से भी चलती है। इसकी क्षमता 2 क्विंटल प्रति घंटे की है।

Edited By: Abhishek Kumar