भागलपुर [शंकर दयाल मिश्रा]। वसंतोत्सव और चुनावोत्सव शुरू है। मां शारदे के पूजन के साथ ही होली की शुरुआत हो गई है। इस बार की होली खास होगी। अबकि कादो-मिट्टी, रंग-गुलाल के साथ वोटों वाली एक्सटेंडेड होली है। यानी बोलो नेता-कार्यकर्ता सब होरि है...!

बात भागलपुर लोकसभा सीट की। सवाल यही है कि आखिरी होली (चुनावी जीत की होली) कौन खेलेगा! पिछले हफ्ते हुई बारिश ने यहां के चुनावी परिदृश्य पर जमी घूल की परत को लगभग धो डाला है। 10 फरवरी को भाजपा के स्थानीय नेताओं की ओर से जारी एक प्रेस रिलीज से संकेत साफ है कि यहां के पूर्व सांसद व भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उम्मीदवार होंगे। शुरू की लाइन से ही समझने की कोशिश करें- भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अपने संसदीय क्षेत्र भागलपुर का सघन दौरा शुरू कर दिया है...। विज्ञप्ति की आगे की लाइनों में इसे और मजबूती दी गई है। दो दिन पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और शाहनवाज हुसैन की मुलाकात हुई थी। तब शाहनवाज की ओर से जारी तस्वीर में दोनों नेताओं के बॉडी लैंग्वेज को देखकर ही शाहनवाज की दावेदारी कन्फर्म मानी जाने लगी थी। दूसरी ओर महागठबंधन की ओर से युवा राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व वर्तमान सांसद शैलेश कुमार उर्फ बूलो मंडल की उम्मीदवारी तय है।

हालांकि अभी महगठबंधन को बिहार में स्वरूप लेना शेष है। कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा ने अपनी चाहत बता दी है कि पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़कर भागलपुर सीट से खोई प्रतिष्ठा हासिल करे। उनकी चाहत को नेतृत्व स्तर पर कितना तरजीह मिलेगा यह तो समय बताएगा। जबकि भाजपा एनडीए को विस्तार देने के उद्देश्य से पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर डोरे भी डाल रही है। एक हफ्ता पहले पूर्णिया के प्रमंडलीय सम्मेलन में शामिल होने जा रहे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कटिहार में कहा था कि मांझी आना चाहें तो हम स्वागत करेंगे। लिहाजा कह सकते हैं कि गठबंधनों का बाजार अभी सजना बाकी है। इस बाजार में किसकी कितनी कीमत होगी और कौन कहां बिकेगा, इसका कयास से सत्ता के गलियारों से लेकर शाह मार्केट की गलियों तक में लगाया जा रहा है!

आइये फिर लौटते हैं भागलपुर! प्रत्याशियों को लेकर जो संभावनाएं दिख रही है उसको आधार बनाकर बात करते हैं। जातीय खांचे और कुनबाई विस्तार से इतर मुद्दों की बात करें तो इस बार का चुनाव पांच साल बनाम आठ जोड़ पांच साल का होगा। वर्तमान सांसद बूलो मंडल का पांच वर्ष का कार्यकाल और पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन का आठ साल कार्यकाल तथा 2014 में चुनाव हारने के बावजूद क्षेत्र को लेकर उनकी गतिविधियों का आकलन किया जाएगा। दोनों के कद, जनता के बीच उपलब्धता और कार्य व्यवहार की भी तुलना होगी।

शाहनवाज हुसैन करीब दो दशक निर्विवाद तौर पर राष्ट्रीय स्तर नेता हैं। बूलो मंडल पर भी चार वर्ष से राष्ट्रीय टैग लगा हुआ है। दोनों ही नेता व्यवहार कुशल, विनम्र और सुलभ हैं। ऐसे में बात उनके कार्यकाल और उनकी पार्टियों, गठबंधन और खुद उनकी हैसियत की होगी। राजनीतिक विश्लेषक विजय वर्धन कहते हैं कि इस लिहाज से तो शाहनवाज का पलड़ा बहुत भारी दिखता है। इसमें कोई शक नहीं कि शाहनवाज की राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक छवि है। बूलो को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने के लिए अभी बहुत जोड़-तोड़ और संघर्ष करना होगा। दूसरी तरफ शाहनवाज के विरोधी भी उनके इस बात के कायल हैं कि जब से उन्होंने भागलपुर सीट को पकड़ा है तब से जीत हो या हार हमेशा यहां की जनता के बीच हैं।

2006 में भागलपुर आने के बाद ऐसा शायद ही कोई महीना हो जब वे यहां आकर क्षेत्र भ्रमण पर न गए हों। हर पर्व-त्योहार, ईद-दिवाली, होली-दशहरा, वसंतोत्सव में तो वे पंडाल-पंडाल घूमते ही हैं। उनके बारे में यहां तक कहा जाता है कि मुसलमानों में भी उनके नाम पर मतों का एक अच्छा प्रतिशत भाजपा को मिल जाता है। यानी सभी जातियों में कमोवेश शाहनवाज फैक्टर काम करता है। अगर भितरघात, नोटा नहीं रहता तो 2014 में बिना जदयू के सहारे के शाहनवाज संसद में होते। तब वे नोटा से कम वोट यानी महज नौ हजार वोट से हार गए। पर इस बार की स्थिति बहुत बदली हुई है। शाहनवाज का अपना फेस वैल्यू बरकरार है। भाजपा का जदयू और लोजपा से वर्तमान में गठबंधन बना हुआ है। यह स्थिति शाहनवाज के लिए 2009 के चुनाव से बहुत ही अधिक मजबूत बनाने में सहायक होगी। तो कह सकते हैं कि फिर से मतगणना के दिन चार्टर प्लेन आएगा।

तो क्या नामों और चेहरों की चकाचौंध में वोटर निढाल हो वोट करेंगे या विकास की बातें भी होंगी? दोनों के कार्यकाल की उपलब्धियों की चर्चा भी होंगी? इसके जवाब में विजय वर्धन कहते हैं कि शाहनवाज ने कितना काम अपने कार्यकाल में किया और कितना काम इस पांच साल में क्षेत्र के लिए किया और क्या नहीं किया, इससे अधिक चर्चा बूलो मंडल के काम की होगी। क्योंकि वर्तमान में सांसद तो बूलो मंडल ही हैं। उनके कार्य धरातल पर बहुत दिखते नहीं। 2016 वाले प्रलयंकारी बाढ़ के दौरान सक्रियता, कहलगांव और बांका को जोडऩे वाली सड़कों की दुर्दशा, अन्य योजनाओं की प्रगति सब में तो उनका प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है। राजद के कई कार्यकर्ताओं ने पिछले चुनावों में फ्लेक्स, पोस्टर आदि छपवाए कि उन्हें चुनाव के बाद मलाई खाने को मिलेगी। लेकिन साहब ने मलाई तो क्या अपने कार्यकर्ताओं को रामप्यारी चाय भी नसीब नहीं होने दी। मलाई की चाहत में जुड़े कार्यकर्ताओं पर कुछ होटलों और रेस्तराओं के खाने का बिल भी अब तक बाकी है। कुल मिलाकर अगड़ा, पचपनियां, महादलित और दलित मतों के गोलबंदी का कोई सटीक काट बुलो नहीं निकाल पाए तो एक खास तबके की पृष्ठभूमि के बावजूद बूलो के लिए कठिन होगी डगर पनघट की।

Posted By: Dilip Shukla

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