बांका [डॉ राहुल कुमार]। देश के सौ पिछड़े जिलों की सूची में बांका टॉप पर है। इसकी धरती का आधा से अधिक 1.72 लाख हेक्टेयर जमीन बंजर और अकृषि योग्य है। यही इसके पिछड़ेपन की बड़ी वजह है। सदियों से यह जमीन बेकार पड़ी है। जयपुर, कटोरिया, बौंसी, फुल्लीडुमर, बेलहर, चांदन, भैरोगंज और बांका प्रखंड की अधिकांश आबादी सदियों से इस बंजर से संघर्ष कर रही है। पिछले पांच-सात साल की मेहनत से इस बंजर का मंजर बदलता दिख रहा है।

 

आम के इस मौसम में पहाड़ और बंजर अल्फांसो, जरदालू, ब्लैक मैंगो, मालदह, स्वर्णरेखा, आम्रपाली जैसे आम की वेराइटी की खुशबू से नहा रहा है। जिस उबड़-खाबड़ धरती दस साल पहले तक इस जेठ की धूप में एक दूब नहीं दिखती थी, वहां आम के बागों ने हरियाली की चादर फैला रखी है। पौधे अभी जरूर छोटे हैं, मगर काम और मकसद दोनों काफी बड़ा है। बंजर पर आम की बागवानी का शुरू हुआ सफर थमने का नहीं ले रहा है।हर साल बंजर पर हरियाली की चादर दुनी हो रही है।

सौ से पांच हजार तक लगा चुके पौधा

बाबूमहल के नूनेश्वर मरांडी की बागवानी ने 2010 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ध्यान खींचा। वे बंजर पर लगा उनका बगीचा देखने आए। सीएम के आगमन पर बंजर के बदलाव की कहानी जिला भर के किसानों ने देखी। इसके बाद बंजर पर आम बागवानी हर साल तेजी से बढ़ रहा है। एक-एक किसान पांच सौ से पांच हजार तक पौधा लगा चुके हैं। नई वेरायटी के कारण साल दो साल में ही इसमें फलन शुरू हो रहा है। खुद नुनेश्वर के पास अब आम का दो हजार तैयार पौधा है। सापू के शिवलाल मुर्मू ने तो पहाड़ पर 500 पौधा लगा दिया है। मुखिया सुरेश यादव एक हजार पौधे का आम बाग तैयार कर चुके हैं।

जोगमारन के अरूण चौधरी के पास एक हजार पौधा है। जयपुर बसमत्ता के पंचानन चरवाहा के पास 18 सौ पौधे का आम बाग फलन दे रहा है। जयकांत यादव, संतोष यादव, श्रीकांत यादव, राजेश यादव, मणिकांत यादव, श्याम सुंदर यादव इसी पंचायत में 25 हजार आम का पौधा तैयार कर चुके हैं। अभी गांव से आम ट्रक पर भरकर जा रहा है। सिलजोरी के बासुकीनाथ दूबे, पांडेयडीह के राहुल पांडे, नवाडीह के रजत सिंहा, बेलौनी में गौरीशंकर तंबोली, साधु तंबोली, दुल्लीसार में शंभू वर्णवाल, तरपतिया में वासुदेव यादव, छाताकुरूम में विनोद सिंह, प्रमोद सिंह सबके पास दो से पांच सौ तक आम का पेड़ तैयार हो गया है।

 

दस हजार बागवानी पौधा तैयार कर चुके किसान रत्न नूनेश्वर मरांडी बताते हैं कि बंजर वाले इलाके में लेागों को परदेश कमाने के सिवा कोई उपाय नहीं था। लेकिन युवा किसानों के प्रयोग ने इलाके के पिछड़ेपन को दूर करने का बेड़ा उठा लिया है। बंजर पर एक बीघा आम बाग ऊपजाउ जमीन के धान-गेहूं से कम से कम दोगुनी आमदनी दे रहा है। अगर फलन इस साल जैसा हो जाए तो आमदनी तीन से चार गुणा तक अधिक होगा। बसमत्ता के जयकांत, संतोष आदि ने बताया कि परदेश में कोई उपाय नहीं देख, उनलोगों ने बंजर का सीना तोड़ना शुरू किया। अब बदलाव साफ दिख रहा है।

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