कांटों के बीच से 'सफेद मोती' निकालने का हुनर! जानिए तालाब से थाली तक कैसे पहुंचता है मखाना; बेहद जटिल है तकनीक
Makhana Production Process: यह लेख मखाना उत्पादन की जटिल और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया का वर्णन करता है, जिसमें गहरे पानी में ...और पढ़ें

Makhana Production Process: तालाब के कीचड़ से निकलकर कैसे बनता है दूधिया सफेद मखाना? जानिए बीजों की चुनाई से लेकर लावा फूटने की पूरी जटिल प्रक्रिया
HighLights
गहरे पानी में बीज से मखाना की खेती।
कीचड़ से बीजों की जोखिम भरी कटाई।
आग पर लावा फोड़ने की जटिल प्रक्रिया।
डिजिटल डेस्क, भाागलपुर। Makhana Production Process: डाइनिंग टेबल पर सूखे मेवों के साथ सजा या सुपरमार्केट के एयरटाइट पैकेटों में रोस्टेड-फ्लेवर्ड रूप में बिकने वाला मखाना आज पूरी दुनिया में सुपरफूड का सिरमौर बन चुका है। लेकिन दूधिया सफेद रंग का यह हल्का और पौष्टिक दाना थाली तक कैसे पहुंचता है, इसका सफर रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
मखाने की खेती कोई सामान्य फसल उगाने जैसी नहीं है, बल्कि यह अथाह धैर्य, गहरे पानी के जोखिम और धधकती आग के सामने शारीरिक परीक्षा का ऐसा संगम है, जिसे कृषि जगत की सबसे जटिल विधाओं में गिना जाता है।
गहरे कीचड़ में सांस रोककर बीजों की तलाश
मखाना का वानस्पतिक नाम यूरियाल फेरोक्स (Euryale ferox) है। इसकी शुरुआत दिसंबर से जनवरी के बीच जलजमाव वाले तालाबों, प्राकृतिक चौर या उथले खेतों में बीजों के अंकुरण से होती है। अप्रैल-मई तक तालाब की सतह बड़े, गोल और तीखे कांटों से भरे विशाल पत्तों से ढक जाती है।
इसके बैंगनी फूल जब फल का रूप लेते हैं, तो वे कांटेदार स्पंज जैसे होते हैं। जुलाई-अगस्त में फल पककर फट जाते हैं और उनके भीतर से निकले बीज कुछ घंटों तक पानी में तैरने के बाद भारी होकर तालाब की तली में 4 से 6 फीट गहरे कीचड़ में धंस जाते हैं।
यहीं से शुरू होता है सबसे खतरनाक चरण—'हार्वेस्टिंग'। पारंपरिक मछुआरा और मल्लाह समुदाय के कुशल किसान बांस से बने विशेष औजार जिसे 'गांज' या 'खौंचा' कहा जाता है, लेकर पानी में उतरते हैं। वे बार-बार गहरे पानी में डुबकी लगाते हैं, अपनी सांस रोकते हैं और कांटों से बचते हुए कीचड़ को छानकर बीज निकालते हैं।
धुलाई, सुखाना और छलनी से ग्रेडिंग
कीचड़ से निकाले गए इन कच्चे काले बीजों को 'गुड़ी' कहा जाता है। बीजों के ऊपर एक लाल रंग की झिल्लीदार परत होती है। किसान पैरों और चटाइयों से रगड़कर इस झिल्ली को धोते हैं। इसके बाद इन्हें साफ पानी में धोकर खुले मैदान में धूप में सुखाया जाता है।

धूप में सुखाने के दौरान नमी का सटीक स्तर रखना सबसे बड़ा विज्ञान है; अगर बीज ज्यादा सूख गया तो भूनते वक्त फूट जाएगा और कम सूखा तो लावा नहीं बनेगा। इसके बाद विभिन्न छेदों वाली पारंपरिक छलनी से बीजों की छंटाई की जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में 4 सूता (छोटा), 5 सूता (मध्यम) और 6 सूता (बड़ा दाना) कहा जाता है।
आग का इम्तिहान और एक झटके में फूटता लावा
मखाना बनाने का अंतिम और सबसे कठिन पड़ाव है 'लावा फोड़ना' (पॉपिंग)। इसके लिए मिट्टी की विशेष भट्ठियां तैयार की जाती हैं, जिन पर लोहे या मिट्टी की चार से पांच कड़ाहियां कतार में रखी होती हैं। कुशल कारीगर लगातार धधकती आग के सामने बैठकर इन बीजों को अलग-अलग तापमान वाली कड़ाहियों में क्रमवार भूनते हैं।
जब बीज के भीतर की नमी भाप बनकर उच्च दबाव बनाती है, तब कारीगर अंगारों से निकले खौलते हुए बीज को तुरंत एक मोटी लकड़ी के पट्टे पर रखते हैं और हाथ में पकड़ी लकड़ी की भारी थापी (मुंगरा) से उस पर एक सटीक और जोरदार प्रहार करते हैं।
चोट पड़ते ही कड़ा काला छिलका 'पटाक' की आवाज के साथ टूट जाता है और अंदर से सफेद, फूला हुआ मखाना छिटककर बाहर आ जाता है। यह काम इतना तेज और सटीक होना चाहिए कि बीज ठंडा होने से पहले ही उस पर वार हो सके। कारीगरों के हाथों में छालों और पसीने की धार के बीच यह सदियों पुरानी कला आज भी जिंदा है।
मशीनीकरण के दौर में भी इंसानी हुनर बेजोड़
यद्यपि हाल के वर्षों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और निजी कंपनियों ने मखाना ग्रेडिंग और पॉपिंग की स्वचालित मशीनें विकसित की हैं, लेकिन आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस मखाने को प्रीमियम ग्रेड और 100% साबुत दूधिया लावा माना जाता है, वह पारंपरिक कारीगरों के हाथों से तैयार किया हुआ ही होता है। यही कारण है कि पानी, कीचड़, कांटे और आग की भट्ठी से तपकर निकलने वाले इस मखाने को सिर्फ खाद्यान्न नहीं, बल्कि किसानों के पसीने से रचा गया 'सफेद सोना' कहा जाता है।
