भागलपुर [डॉ. राजीव रंजन ठाकुर]। लिंग पुराण में कहा गया है - 'लीलार्थ गमकं चिन्हं इति अभिधीयते'। अर्थात जन्म व मृत्यु दोनों को एक साथ परिभाषित करने वाला लिंग शब्द परम कल्याणकारी शिव रूप है।

शिव चेतन ज्योति विन्दु हैं। इनका अपना कोई स्थूल या सूक्ष्म शरीर नहीं है। वह परमात्मा हैं। शिव स्वयं ज्ञान प्रकाश उत्पन्न करते हैं जो कुछ ही समय में सारे विश्व में फैल जाता है। इसके फैलते ही कलियुग और तमोगुण के स्थान पर संसार में सतयुग और सतोगुण की स्थापना हो जाती है। अज्ञान-अंधकार तथा विकारों का विनाश हो जाता है। वैदिक धर्म ग्रंथों में शिव को सभी विद्याओं का जनक माना गया है। वे तंत्र-मंत्र, योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि और अंत हैं। इतना ही नहीं वह संगीत के आदि सृजनकर्ता भी हैं और नटराज के रूप में कलाकारों के आराध्य भी हैं।

श्वेताश्वर उपनिषद् में कहा गया है कि-'एकोहि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु'। अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल एकमात्र रूद्र ही हैं दूसरा कोई नहीं। वहीं शिव पुराण के अनुसार पवन देव ने स्वयं कहा है कि सृष्टि की शुरुआत में केवल शिव ही मौजूद रहते हैं। वे ही अर्धनारीश्वर रूप में संसार की सृष्टि करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और अंत में उसका संहार भी करते हैं। चारो वेदों और 18 पुराणों में भी समस्त देवताओं को भगवान रूद्र की पूजा-आराधना करते हुए प्रस्तुत किया गया है।

रामचरित मानस में जहां तुलसीदास जी ने लिखा है-लिंग थापि विधिवत करि पूजा, शिव समान प्रिय मोहि न दूजा, वहीं श्रीमद् भागवत गीता में भी भगवान रूद्र की पूजा को श्रेष्ठ बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने पत्नी लक्ष्मी सहित सर्वप्रथम भगवान सदाशिव की पूजा करके ही तेज प्राप्त किया था। वेद मंत्रों के अधिष्ठाता होने के कारण भोलेनाथ को अघोर और समस्त लोकों में व्याप्त रहने के कारण तत्पुरुष भी कहा गया है। तत्वज्ञानी व्यक्ति महेश्वर शिव को क्षर और अक्षर से परे मानते हैं। जिस कारण जीव समस्त प्राणी स्वरूप शिव का स्मरण करके इस पंचतत्व की काया से मुक्त हो जाता है। इसीलिए तो रूद्र संहिता में कहा गया है कि- 'ऊं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र प्रचोदयात'।

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