भागलपुर [विकास पांडेय]। विगत दिनों सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् पद्मश्री डॉ. के. के. मोहम्मद तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर प्राचीन इतिहास विभाग में व्याख्यान देने भागलपुर आए थे। उस दौरान सिल्कसिटी के कचहरी चौक के समीप स्थित शिव कॉलोनी में टीएनबी विधि महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पंजियारा द्वारा पुरातात्विक क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य करने के लिए उनका भव्य सम्मान किया गया। इस अवसर पर उनकी पत्नी श्रीमती राबिया मोहम्मद को भी शॉल व पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। के. के. मोहम्मद ने ही खोज कर सर्वप्रथम बताया था कि बाबरी मस्जिद के पहले वहां था राम मंदिर था। 

उसमें विधि महाविद्यालय के प्रोफेसरों व गणमान्य अतिथियों ने केके मोहम्मद के प्रखर व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। इस समारोह में केके मोहम्मद ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए। विदित हो कि इस प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ने देशभर में कई पुरातात्विक महत्व की धरोहरों की खोज कर खासी प्रसिद्धि पाई है। उन्होंने अयोध्या स्थित राम मंदिर की खुदाई कर सर्वप्रथम सिद्ध किया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद के पहले राम मंदिर था। पुरातत्व अन्वेषण विभाग की उस रिपोर्ट को आधार मानकर सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 09 नवंबर, 2019 को सर्व सम्मति से अपना फैसला रामलला के पक्ष में दिया। इसमें मुख्य वक्ताओं में डॉ. अरविंद पंजियारा के अलावा ति.मा. भा. विवि के स्नातकोत्तर प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बिहारी लाल चौधरी, टीएनबी कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. मिथिलेश सिन्हा, टीएनबी लॉ कॉलेज के लीगल लैंग्वेज विभाग के अध्यक्ष प्रो. चंद्र मौलेश्वर पाण्डेय, प्रो. ओपी पाण्डेय, पार्षद हंसल सिंह, प्रमोद सिंह, महेश साह, सहजानंद तिवारी सहित कई गणमान्य लोग शामिल थे।

कुम्हरार में अशोक के केशरिया स्तूप की खोज का इन्हें श्रेय

समारोह में वक्ताओं ने कहा कि डॉ. करीनगामन्नु कुझहीयील मोहम्मद 1997 से 2001 तक पटना स्थित पुरातत्व अन्वेषण विभाग में कार्यरत रहे। उस दौरान उन्होंने कभी राजा अशोक की राजधानी रही कुम्हरार में खुदाई कर बौद्ध स्तूप (केशरिया)सहित उनके शासनकाल की कई नई धरोहरों की खोज की थी। उस दौरान उन्होंने वैशाली में खुदाई कराकर वहां से भी नए बौद्ध स्तूप की खोज की थी।

आगरा में प्रथम क्रिश्चियन चैपल का लगाया था पता

वक्ताओं ने कहा कि सन् 2001 -2003 तक आगरा में सेवारत रहने के दौरान खुदाई कराकर बादशाह अकबर द्वारा फतेहपुर सिकरी में स्थापित प्रथम क्रिश्चियन चैपल का पता लगाया था। सन् 2008-2012 तक दिल्ली में काम करने के समय पुरातत्वविद् के के मोहम्मद ने अकबर द्वारा निर्मित इबादतखाना (दीन ए इलाही) की खोज की थी।

खजुराहो से प्राचीन 200 शिव व विष्णु मंदिरों के किए पुनरुद्धार

वे 2003 से 2008 तक छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में सक्रिय रहे। वहां छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के गढ़ दंतेवाड़ा में बारसुर एवं समलुर मंदिर का पुनरुद्धार कराया। मध्यप्रदेश के ग्वालियर से 40 किमी दूर बटेश्वर (मोरेना) में लगभग 200 शिव व विष्णु मंदिरों के पुनरुद्धार भी किए। वे खजुराहों से 200 वर्ष पूर्व के बने हुए प्रमाणित हुए हैं। इस क्षेत्र में लंबे समय तक निर्भय सिंह गुर्जर एवं गदशोया सरीखे डाकूओं का कब्जा रहने के कारण वर्षों तक वे क्षेत्र जनजीवन से कटे रहे थे।

साधारण परिवार में जन्म लेकर हासिल कीं असाधारण उपलब्धियां

समारोह में वक्ताओं ने बताया कि डॉ. केके मोहम्मद ने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर कड़े परिश्रम व लगन से इतनी उपलब्धियां हासिल कीं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा केरल के केलीकट में हुई थी। यह नगर उनका जन्मस्थल भी है। वहां 01 जुलाई 1952 को उनका जन्म हुआ था। इन्होंने 1973-1975 के दौरान अलीगढ़ मुश्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में एमए की डिग्री हासिल की। 1976-77 में इन्होंने दिल्ली स्थित पुरातत्व अन्वेषण विभाग से डिप्लोमा प्राप्त किया।

बिहार में योगदान के दौरान इनके कार्यों में आया निखार

इनका प्रारंभिक पदस्थापना 1988 से 1990 तक चेन्नई में हुई थी। वहां से वे गोवा गए। वहां वे 1991 से 1997 तक रहे। सन् 1997 में वहां बिहार आने के साथ ही इनकी प्रतिभा व मेहनत ने रंग लाना शुरू किया और वे प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ते चले गए। समारोह में केके मोहम्मद ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने उन्हें व उनकी पत्नी को सम्मानित किए जाने के लिए आयोजन समिति को धन्यवाद दिया। इस समारोह में धन्यवाद ज्ञापन टीएनबी लॉ कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के प्रोंफेसर डॉ. अरविंद पंजियारा ने किया।

 

Posted By: Dilip Shukla

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