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होलिका दहन की तिथि पर विद्वानों में मतभेद, 122 साल बाद चंद्रग्रहण का दुर्लभ संयोग; क्या है सही तारीख?

Published: Mon, 02 Mar 2026 02:52 PM (IST)

इस वर्ष होलिका दहन की तिथि (Holika Dahan Date 2026) को लेकर विद्वानों में मतभेद है, क्योंकि 122 साल बाद ...और पढ़ें

होलिका दहन की तिथि पर विद्वानों में मतभेद, 122 साल बाद चंद्रग्रहण का दुर्लभ संयोग (AI Generated Image)

होलिका दहन की तिथि पर विद्वानों में मतभेद, 122 साल बाद चंद्रग्रहण का दुर्लभ संयोग (AI Generated Image)

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जागरण संवाददाता, भागलपुर। इस वर्ष होली आस्था, खगोल और तिथि गणना के विशेष संगम के कारण चर्चा में है। लगभग 122 वर्ष बाद ऐसा संयोग बना है, जब होली के आसपास चंद्रग्रहण पड़ रहा है।

1904 के बाद पहली बार यह स्थिति बनी है, जिससे होलिका दहन की तिथि को लेकर विद्वानों में दो मत उभर आए हैं। हालांकि होली 4 मार्च को देशभर में मनाई जाएगी, लेकिन होलिका दहन 2 या 3 मार्च को हो इसी पर विमर्श जारी है।

तिथि, भद्रा और ग्रहण का गणित

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च की शाम 5:55 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च की शाम 5:07 बजे तक रहेगी। 3 मार्च को दोपहर 3:20 से शाम 6:47 बजे तक चंद्रग्रहण रहेगा।

भारत में दृश्य होने के कारण इसका सूतक सुबह 9:19 बजे से प्रभावी माना जाएगा। यही कारण है कि तिथि, भद्रा और ग्रहण के त्रिकोण ने निर्णय को जटिल बना दिया है।

दो मार्च के समर्थन में मत

दूसरे मत के अनुसार 2 मार्च की संध्या प्रदोष काल में पूर्णिमा का स्पर्श हो रहा है, जो होलिका दहन के लिए आवश्यक माना गया है। हालांकि इस दिन शाम 5:55 बजे से भद्रा लग जाएगी।

कुछ विद्वान मानते हैं कि भद्रा के मुख काल (रात्रि 2:32 बजे से) को छोड़कर, विशेषकर भद्रा के पुच्छ काल में दहन किया जा सकता है। 2 मार्च को शाम 6:22 से 8:53 बजे तक का समय दहन के लिए संभावित मुहूर्त बताया गया है।

तीन मार्च के पक्ष में तर्क

भागलपुर के बूढ़ानाथ मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित भूपेश मिश्रा का मत है कि 3 मार्च को प्रदोष काल में पूर्णिमा का प्रभाव रहेगा और शाम 6:47 बजे ग्रहण मोक्ष के बाद भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा। ऐसे में ग्रहण समाप्ति के बाद होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत और शुभ होगा। उनके अनुसार महिलाएं सूतक लगने से पहले सुबह पूजन कर सकती हैं, जबकि दहन ग्रहण मोक्ष के बाद उचित रहेगा।

आध्यात्मिक संदेश

होलिका दहन केवल तिथि का विषय नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। ग्रहण का यह दुर्लभ संयोग आत्ममंथन और संयम का भी संदेश देता है। चाहे दहन 2 को हो या 3 को, आस्था का मूल भाव शुद्ध मन, संकल्प और श्रद्धा है।

रंगोत्सव 4 मार्च को उल्लास के साथ मनाया जाएगा, लेकिन इस बार की होली खगोल और अध्यात्म के अद्भुत संगम के रूप में याद रखी जाएगी।