फरक्का बैराज ने छीनी बिहार के अंग नगरी से हिलसा की खुशबू! गंगा से स्वादिष्ट मछली गायब, बंगाल से 3000 रुपये KG मंगा रहे
Hilsa Fish in Bhagalpur Ganga: फरक्का बराज के निर्माण के बाद भागलपुर की गंगा से हिलसा मछली विलुप्त हो गई ...और पढ़ें

Hilsa Fish in Bhagalpur Ganga: गंगा की तेज धार में मिलने वाली चांदी जैसी चमकीली स्वादिष्ट हिलसा मछली (प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
फरक्का बराज से पहले भागलपुर गंगा में हिलसा बहुतायत में थी।
बराज निर्माण से हिलसा का प्राकृतिक प्रजनन मार्ग अवरुद्ध हुआ।
अब बंगाल से मंगाई जाती है, 'मिर्का' मछली बनी विकल्प।
डिजिटल डेस्क, भागलपुर। Hilsa Fish in Bhagalpur Ganga:अपने खास जायके और भीनी-भीनी खुशबू के लिए दुनिया भर में मशहूर हिलसा मछली— जिसे बंगाल में 'इलिस माछ' के नाम से जाना जाता है- का कभी बिहार के अंग क्षेत्र से गहरा नाता रहा है। आज भले ही बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश को हिलसा का प्रमुख केंद्र माना जाता हो, लेकिन इतिहास के पन्नों और मछुआरों की स्मृतियों में दर्ज है कि कभी भागलपुर इस अनमोल मछली का प्राकृतिक आश्रय स्थल और प्रमुख प्रजनन क्षेत्र हुआ करता था।
गंगा की तेज और मचलती जलधारा में अठखेलियां करने वाली इस स्वादिष्ट मछली का अंग नगरी से पलायन फरक्का बराज के अस्तित्व में आने के साथ ही हो गया। बराज के निर्माण के बाद गंगा की अविरल और तीव्र धार स्थिर हो गई, जिससे समुद्र से मीठे पानी की ओर प्रजनन के लिए विपरीत दिशा में तैरने वाली हिलसा का स्वाभाविक रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। नतीजा यह हुआ कि कभी भागलपुर की पहचान रही यह मछली आज यहां की गंगा से पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है।
अजगैवीनाथ से कहलगांव तक कभी होता था हिलसा का बसेरा
पुराने मछुआरों और स्थानीय बुजुर्गों की मानें तो साठ और सत्तर के दशक में भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित अजगैवीनाथ धाम से लेकर कहलगांव और बटेश्वर स्थान तक गंगा के कछार में हिलसा मछली भारी तादाद में मिला करती थी। मानसून की शुरुआत होते ही गंगा की उफनती धारा में यह मछली बंगाल की खाड़ी से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर भागलपुर और उससे आगे प्रयागराज तक पहुंचती थी।
स्थानीय मछली विक्रेता बताते हैं कि उस दौर में गंगा किनारे सुबह-शाम चांदी जैसी चमकीली हिलसा की टोकरियां उतरा करती थीं और स्थानीय बाजारों में इसकी जबरदस्त रौनक रहती थी। लेकिन फरक्का बराज बनने के बाद गंगा में पानी का ठहराव बढ़ गया और मछली का माइग्रेशन (प्रवासन चक्र) टूट गया। धीरे-धीरे भागलपुर की गंगा से हिलसा का नामोनिशान मिट गया।
अब बंगाल से विशेष आर्डर पर मंगाई जाती है इलिश
वर्तमान में भागलपुर के बाजारों की स्थिति यह है कि स्थानीय गंगा में हिलसा का मिलना नामुमकिन हो चुका है। मीनी मार्केट, स्टेशन चौक और आदमपुर बाजार के मछली व्यवसायियों का कहना है कि अब हिलसा केवल विशेष मांग पर ही उपलब्ध होती है।
शहर में बसे कुछ गिने-चुने बंगाली परिवार और मछली के चुनिंदा शौकीन जब अग्रिम आर्डर देते हैं, तब मालदा, हावड़ा या कोलकाता की मंडियों से बर्फ में पैक कर इसे मंगाया जाता है। परिवहन खर्च और सीमित उपलब्धता के कारण यह मछली अब बेहद महंगी बिकती है, जो आम लोगों की पहुंच से काफी बाहर हो चुकी है।
हिलसा की कमी पूरी कर रही 'मिर्का', शौकीन बोले- वो स्वाद कहां
हिलसा की अनुपलब्धता और आसमान छूती कीमतों के बीच स्थानीय लोगों ने इसका विकल्प तलाश लिया है। अधिकांश लोग अब स्वाद में हिलसा से कुछ हद तक मिलती-जुलती स्थानीय 'मिर्का' मछली से अपनी पसंद पूरी कर रहे हैं।
स्वाद के शौकीनों की पहली पसंद हिलसा का कभी प्रमुख प्राकृतिक आवास रहा था भागलपुर; गंगा की तेज धार में होती थी बहुतायत पैदावार
फरक्का बराज के निर्माण के बाद गंगा का बहाव धीमा होने और प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध होने से अंग क्षेत्र से पूरी तरह पलायन कर गई हिलसा
अजगैवीनाथ धाम (सुल्तानगंज) से कहलगांव के बीच कभी आसानी से मिलने वाली मछली अब स्थानीय बाजार में बंगाली परिवारों के आर्डर पर मंगाई जा रही
स्थानीय बाजारों में हिलसा के स्वाद से मिलती-जुलती मिर्का मछली की बढ़ी मांग; मछली व्यापारियों और जानकारों ने बयां किया दर्द
बाजार में मछली की खरीदारी करने पहुंचे बंगाली समुदाय के अनिंदो चटर्जी और सुब्रतो मुखर्जी कहते हैं, "इलिस माछ सिर्फ एक भोजन नहीं, हमारी सांस्कृतिक परंपरा और स्वाद की पहचान है। पहले भागलपुर की गंगा से ताजी हिलसा मिल जाया करती थी, जिसका मीठा स्वाद आज भी याद आता है। अब तो खास त्योहारों पर बाहर से मंगाकर ही मन बहलाना पड़ता है। वह भी तीन हजार रुपये किलो। लेकिन वो स्वाद कहां, जो स्वाद गंगा की ताजी मछली में था, वह हफ्तों बर्फ में दबी मछली में कहां!"
पर्यावरणविदों का भी मानना है कि यदि बराजों पर सुरक्षित 'फिश-पास' (मछलियों के आवागमन का गलियारा) की मुकम्मल व्यवस्था नहीं की गई, तो गंगा की यह ऐतिहासिक धरोहर केवल किताबों और पुरानी कहानियों तक ही सिमट कर रह जाएगी।
