बांका [जेएनएन]। शक्तिपीठ के नाम से विख्यात गोडधुवा दुर्गा मंदिर के दरबार में आशीर्वाद की बरसात होती है। यहां हर कोई की मनोकामना पूर्ण होती है। बता दें कि लगभग ढाई सौ वर्षो के इतिहास को अपने गर्भ में छुपाए मंदार क्षेत्र के शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध प्रखंड के गोडधुवा गांव स्थित मां गोडधुवा दुर्गा अपने भक्तों को कभी भी निराश नहीं करती हैं। दिनों दिन इनके प्रति आस्था में वृद्धि ही देखी जा रही है। गोडधुवा ग्राम को प्लेग जैसी महामारी से बचाने वाली मां के समक्ष संकट में पड़े सरकारी महकमे के पदाधिकारी हो या फिर उनके आशीर्वाद से अपने कार्यो में सफलता हासिल कर चुके परिवार, प्रत्येक वर्ष मां की चरणों में अपनी श्रद्धासुमन अर्पित करने हेतु देश के किसी भी कोने से निश्चित समय पर पहुंच जाते हैं। यूं तो जिले के प्राचीनतम दुर्गा मंदिरों में गोडधुवा स्थित दुर्गा मंदिर सबसे प्राचीन माना जाता है और प्रसिद्धि के मामले में भी मां गोडधुवा दुर्गा की महत्ता अतुलनीय है।

पूजा-अर्चना का पुराना इतिहास

बाराहाट प्रखंड मुख्यालय से लगभग 12 किमी. दक्षिण दिशा में भुरना-सहरना मार्ग से थोड़ा हटकर गोडधुवा ग्राम में प्रत्येक वर्ष हजारों श्रद्धालुजन अपनी मनौती पूरी होने पर जाग्रत मां गोडधुवा दुर्गा को चढ़ावा चढ़ाने पहुंचते हैं। वर्तमान में यहां की जनसंख्या काफी घनी नहीं है पर बड़े बुजुर्गों की मानें तो लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व इतिहास उस समय से आरंभ होता है जिस समय राजतंत्र की प्रथा कायम थी। लक्ष्मीपुर स्टेट में दुर्गा पूजा के दौरान तत्कालीन राजा चंद्रदेव नारायण देव से इसका इतिहास जुड़ा है। नवरात्र के दौरान अपनी कुलदेवी भगवती की अराधना के दौरान उनके दस पुत्रों की मौत हो गई और नवरात्रा भंग हो था।

आक्रोश में आकर राजा ने प्रतिमा को चांदन नदी के तेज बहाव में विसर्जित करवा दिया। उसी रात मां ने भावुक हो कर गोडधुवा गांव के एक दलित मजदूर लैया जाति को स्वप्न देकर जल से बाहर कर गांव में पूजा अर्चना करने को कहा। माता के सपन को ग्रामीणों के समकक्ष रखा। सुबह ग्रामीण जब उक्त स्थल पर पहुंचे तो अचंभित हो गए वहां सचमुच प्रतिमा पड़ी थी। गांव वाले का उत्साह परवान चढ गया और देखते ही देखते ग्रामीणों ने प्रतिमा सहित मेंड़ को उठाकर गोड़धोवा गांव लाया जहां मां को स्थापीत कर पूजा अर्चना शुरू किया।

मैया की आस्था बढ़ती गई। लोगों की मुरादें पूरी होने लगी। और धीरे-धीरे गांव के ही धर्मानुरागी बलदेव सिंह के प्रयास से 1950 में भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान डोमन सिंह, लक्ष्मी पांडे और अन्य ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर को आकर्षक रूप प्रदान किया गया। ग्रामीणों रंजन यादव, किशोर यादव का कहना है कि अभी भी सप्तमी की रात्रि को जब तक उक्त लैया परिवार के लोग मेढ को हाथ नहीं लगाते तब तक मेढ नही उठता है।

प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में पड़ती है पाठा बलि

कहते है मां के समक्ष सच्चे मन से यदि कोई फरियादी कामना करता है तो गोडधुवा उसकी कामना अवश्य पूरा करती है। मनौती पूरी होने पर भक्तों द्वारा नवमी के दिन मूलत: पाठा बलि देकर मां को श्रद्धासुमन अर्पित किया जाता है। मां की महिमा अपरंपार है यहां पर माह के प्रांगण में हजारों श्रद्धालु प्रथम पूजा से ही अपने मनौती के लिए धरना पर बैठती है आज तक जिसने भी जो मांगा है उसकी मुराद पूरी हुई।

क्या कहते प्रबंधन सदस्य

गोडधुवा के रहने वाले पूजा समिति के सदस्य योगी मुकेश ने बताया जिस प्रकार मां के प्रति भक्तों की आस्था में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। ऐसे में यदि पर्यटन विभाग द्वारा क्षेत्र को विकसित किया जाए तो मां के भक्तों को यहां ठहर कर ना सिर्फ पूजन कार्य में आसानी होगी बल्कि आसपास के अन्य ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों का भी अवलोकन करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी।

क्या कहते मंदिर के पुजारी

यहां वर्षों से पूजा करा रहे मंदिर के पुजारी भवेश झा ने कहा कि मां गोडधुवा की यह पूजा स्थल इलाके में अब एक शक्ति पीठ के रूप में जानी जाने लगी है। यहां पहुंचने वाले भक्तों के सभी कष्ट मां दूर करती हैं।

Posted By: Dilip Shukla

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