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बांका [राहुल कुमार]। समाजवादी राजनीति के धुरंधर जार्ज फर्नांडीस बांका को बंबई बनाने का सपना देखकर इस धरती पर उतरे थे। वे दो संसदीय चुनाव भी बांका से लड़े। पर दुर्भाग्य कि दोनों बार इस जूझारु मजदूर नेता को हार का मुंह देखना पड़ा। पहली बार वे बिहार के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज चंद्रशेखर सिंह से 1985 का संसदीय चुनाव हारे। उनके निधन पर 1986 में हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मनोरमा सिंह से जार्ज साहब को हार का सामना करना पड़ा।

हालांकि दूसरे चुनाव में प्रशासन पर गड़बड़ी का आरोप लगा। इसके बाद चुनाव आयोग ने भागलपुर के तत्कालीन डीएम रामसिंगार सिंह के खिलाफ जांच कराई। जांच में दोषी साबित होने पर उस डीएम को बाद में जेल भी जानी पड़ी थी। मतों की गिनती में जार्ज साहब भले ही बांका से हार गए, पर तीन दशक बाद भी बांका की गलियों में जार्ज साहब की कहानियां अब भी जिंदा है। सांसद का चुनाव लड़ने से पूर्व उनका 1972 से ही बांका से जुड़ाव रहा। वे प्रख्यात सोशलिस्ट मधु लिमये के साथ बांका आए।

मधु लिमये के दोनों चुनाव प्रचार की बागडोर जार्ज साहब के ही हाथ थी। जिस कारण मधु लिमये 1973 और 1977 का चुनाव बांका से जीते। इस दौरान करीब डेढ़ दशक तक जार्ज साहब बांका में सक्रिय रहे। वरिष्ठ पत्रकार परमानंद झा बताते हैं कि जार्ज के व्यक्तित्व में युवाओं के प्रति खास आकर्षण था। सभी युवा उनके दीवाने थे। इस दौरान उनका ठिकाना बांका में ढाकामोड़ के समीप सहाय जी का आवास था। क्षेत्र भ्रमण और प्रचार-प्रसार के दौरान भी यही उनका ठिकाना था। तब के छात्र सुभाष यादव कहते हैं कि उनके बांका आने पर उनकी भाषण शैली से युवा काफी प्रभावित थे। वे लोग खुद पढ़ाई छोड़ जार्ज साहब का भाषण सुनने जाते थे।

दिग्विजय के लिए अंतिम बार की बाइक यात्रा

पूर्व केंद्रीय मंत्री जार्ज फर्नांडीस अंतिम बार 2009 में दिग्विजय सिंह के निर्दलीय चुनाव में नामांकन के दौरान बांका आए थे। बांका में उमड़ी अपार भीड़ में उनका वाहन फंस जाने के कारण वे बाइक से नामांकन में शामिल होने समाहरणालय स्थित डीएम के कक्ष में पहुंचे थे। इस दिन वे पीबीएस कॉलेज मैदान की सभा में शामिल हुए। लेकिन, स्वास्थ्य कारणों से उनका संबोधन नहीं हो सका था। वे मंच से लोगों का बस अभिवादन ही कर सके थे।

Posted By: Dilip Shukla

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