भागलपुर। विघ्नहर्ता गजानन गणेश की पूजा अर्चना को पूरा शहर सज-धजकर तैयार है। महादेव पुत्र के स्वागत को शहर के विभिन्न पूजा पंडालों व मंदिरों को भव्य तरीके से सजाया संवारा गया है। शुक्रवार को इसमें गणपति बप्पा विराज जाएंगे। इसे लेकर गुरुवार से ही पूरे शहर का माहौल भक्तिमय हो गया है।

बनवाई गई है आदमकद प्रतिमा

इस बार कई जगह गणपति की विशाल प्रतिमा तैयार कराई गई है। आयोजक मुंबई की तर्ज पर पूजा करने की तैयारी में हैं।

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इनसेट :-

गणेश चतुर्थी का महत्व

भगवान गणेश के जन्म उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गजानन को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।

चतुर्थी तिथि का आरम्भ और समापन समय

हिन्दू पंचाग के अनुसार चतुर्थी तिथि 24 अगस्त 2017 को शाम में 08.27 बजे से आरम्भ होगी। समाप्ति 25 अगस्त को शाम 08.31 बजे होगी। हालांकि 08.31 बजे के बाद भी चन्द्रमा उदित रहेंगे, जो शाम में 09.20 बजे अस्त होंगे। इसलिए जिन श्रद्धालुओं की चंद्र-दर्शन निषेध में आस्था है, उन्हें 09.20 बजे तक चंद्रमा को देखने से बचना चाहिए।

अनुष्ठान के लिए शुभ समय और मुहूर्त

वैदिक पंचाग के अनुसार, इस साल गणपति पूजा का शुभ मुहूर्त शुक्रवार सुबह 11.06 बजे से दोपहर बाद 01.39 बजे तक है। पौराणिक प्रमाणों के अनुसार गजानन श्री गणेश का जन्म दिन के मध्याह्न में हुआ था। लिहाजा गणेश पूजन की यह उपरोक्त अवधि, जो लगभग 2 घटे 33 मिनट की है, हर प्रकार से उत्तम है।

10 दिनों का होता है पूजन

गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन के बाद अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ भगवान गणेश की प्रतिमा का नदी में विसर्जन करते हैं।

स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त

मान्यता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए उस समय को गणेश पूजा के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है। हिन्दू समय गणना के आधार पर सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पांच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पांच भागों को क्रमश: प्रात: काल, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश स्थापना और गणेश पूजा मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिए।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय गणेश पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। मध्याह्न मुहूर्त में भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं।

भाद्रपद की चतुर्थी को हुआ था श्री गणेश का आविर्भाव

हिंदू पंचाग के अनुसार गणेश चतुर्थी त्योहार भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इसी तिथि को मध्याह्न में शक्ति-स्वरूपा देवी पार्वती ने दिव्य-स्नान के समय अपनी त्वचा के मैल से एक बालक का स्वरूप गढ़ा और उसमें प्राण डालकर अपने महल की पहरेदारी में नियुक्त कर दिया। बालक की निष्ठा, सजगता और तत्परता इतनी प्रबल थी कि देवाधिदेव शिव भी उसका उल्लंघन नहीं कर पाए और फिर जो हुआ वह तो जग-विदित है।

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र का दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है। इसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है। नारद ने भगवान कृष्ण को कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र का दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जाएगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जाएगा। नारद के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिए गणेश चतुर्थी का व्रत किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गए।

मिथ्या दोष निवारण मंत्र

चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अंत समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिए वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्जित होता है। अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जाएं तो मिथ्या दोष से बचाव के लिए निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिए।

- सिंह : प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:। सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:॥

Posted By: Jagran