जागरण सवांददाता, भागलपुर। पिता की हिम्मत ही है कि कोरोना जैसी महामारी की चपेट में आने के बाद भी परिवार के सभी सदस्यों का भी इलाज में कोई कमी नही होने दी। अंत में कोरोना को ही हारना पड़ा। रामसर के मुजफ्फर अहमद उस समय परेशान हो गए जब उन्हें पता चला कि पुत्र, पुत्री ओर पत्नी कोरोना संक्रमित हो गए हैं। साथ मे उन्हें भी कोरोना ने नही छोड़ा।

उन्होंने कहा कि 15 मई के बाद परिवार का बुरा वक्त शुरू हुआ। अचानक हमारी आंखें लाल हो गई और एक दिन बाद ज्यादा बुखार हो गया। परिवार सभी सदस्य को तेज फीवर ने जकड़ लिया और दो दिन के अंदर ही शरीर में दर्द ऐसा की बिस्तर से उठने की ताकत भी नहीं बची थी। जवाहरलाल नेहरू हॉस्पिटल में एडमिट के लिए गया। लेकिन हॉस्पिटल का जो नजारा दिखा डर गया। देखा कि हर तरफ लोग भाग रहे हैं कोई किसी का सुनने वाला नहीं है मुझे लगा कि अगर मैं यहां रह गया तो किसी को नहीं बचा पाऊंगा। मैं मर ही जाऊंगा और अपने परिवार को बचा भी नहीं पाऊंगा। निजी क्‍लीनिक में कोरोना की जांच करवाने पर सभी संक्रमित निकले। बच्चे पूरी तरह से बेहोश थे। पत्नी भी पूरी तरह से मूर्छित थी, मैं सिर्फ अपने आप को हिम्मत देता रहा। एक दिन मैं अपने बेटे को कई बार आवाज देने के बावजूद वह जवाब नहीं दे पा रहा था। जोर से चिल्लाने के बाद अमन अहमद ने कहा डैडी मुझे सोने दीजिए तब मुझे लगा कि सब कुछ ठीक है बहुत ही दर्दनाक पल था। डॉक्टर की सलाह पर घर में ही इलाज करवाता रहा। 10 दिनों के बाद धीरे-धीरे मैं और परिवार के सदस्य स्वस्थ होने लगे।

पॉजिटिव सोच से हारा कोरोना

स्‍वजनों ने कहा कि सकारात्‍मक सोच से ही कोरोना को हराया जाता है। इसलिए कोरोना से डरें नहीं, बल्कि सावधानी बरतें। तभी कोरोना वायरस के संक्रमण से बचा जा सकता है।

 

Edited By: Dilip Kumar Shukla