भागलपुर [अमरेंद्र कुमार तिवारी]। चिता को जलाने में लकडिय़ों का बेतहाशा इस्तेमाल और इसके धुएं व राख प्रदूषण की चिंता बढ़ा दी है। जल, मिट्टी और वायु के बढ़ते प्रदूषण ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है।

हालांकि इस बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए बरारी श्मशान घाट में शवदाह गृह का निर्माण हो रहा है, जो बीते छह माह से चालू होने के इंतजार में है। लेकिन वह किसी कारण से अभी पूरा नहीं हो पाया है। विभागीय अधिकारियों ने दावा किया है कि यह शवदाह गृह एक माह में चालू हो जाएगा।

रोज जलाए जाते हैं एक दर्जन शव

बरारी श्मशान घाट पर प्रति दिन बिहार-झारखंड जिलों के एक दर्जन शव का रोज अंतिम संस्कार किया जाता है। घाट किनारे लकड़ी विक्रेता की माने तो एक शव को जलाने में तीन से चार क्विंटल तक लकडिय़ां खपत होती है। जिसकी कीमत 3000 हजार रुपये तक होता है।

छह टन लकडिय़ां रोज होती है खपत

औसतन एक दर्जन शव को जलाने में रोज छह टन तक लकडिय़ां खपत होती है। इससे गंगा में राख सहित अन्य अवशिष्ट पदार्थ के समाहित होने से जल कितना प्रदूषित होता होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

अंधाधुध पेड़ों की होती है कटाई

अंतिम संस्कार के लिए सालो भर बड़े पैमाने पर लकडिय़ों की मांग रहती है। नतीजतन नए पौधों को लगाने की अपेक्षा बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई भी होती है। दूसरी ओर, जब ये लकडिय़ां जलाई जाती हैं तो इनसे निकलने वाले धुएं से पर्यावरण में कार्बन के साथ दूसरे खतरनाक कण भी बढ़ जाते हैं। जो पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ाने का काम करता है।

पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में फायदेमंद होगा शवदाह गृह

स्मार्ट सिटी में अगर जल्द मुक्तिधाम यानि विद्युत शवदाह गृह चालू हो जाए तो पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में तो यह काफी फायदेमंद साबित होगा। शव जलाने का खर्च भी आधे से कम हो जाएगा। पैसा और समय की भी बचत होगी। पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा।

धीमी गति से हो रहा निर्माण कार्य

राशि आवंटन के अभाव में शहर में विद्युत शवदाह गृह का निर्माण कछुए की गति से हो रहा है। सरकार ने शवदाह गृह योजना मद के दूसरे फेज की राशि अभी तक आवंटित नहीं की है। जिसकी वजह से भागलपुर ही नहीं मुंगेर, मोकामा और सोनपुर में भी विद्युत शवदाह गृह निर्माण पर ग्रहण लगा हुआ है।

दो करोड़ 35 लाख है निर्माण राशि

बरारी श्मशान घाट पर 2.35 करोड़ की लागत से विद्युत शवदाह गृह का निर्माण बीते वर्ष फरवरी से हो रहा है। अब तक नगर विकास विभाग ने नगर निगम को 1.56 करोड़ रुपये आवंटित किया किया। जानकारी के अनुसार नगर विकास विभाग ने बुडको को दूसरे फेज की राशि अब तक आवंटित नहीं की है।

दूसरे फेज की राशि आवंटित नहीं

राशि आवंटन के अभाव में शहर में विद्युत शवदाह गृह का निर्माण छह माह से बंद है। नतीजा, प्रतिदिन यहां छह टन प्रतिदिन लकड़ी की खपत हो रही है। सूचना है कि सरकार ने शवदाह गृह योजना मद के दूसरे फेज की राशि ही रोक दी। जिसकी वजह से भागलपुर ही नहीं मुंगेर, मोकामा और सोनपुर में भी विद्युत शवदाह गृह निर्माण बंद है।

बरारी श्मशान घाट पर 2.35 करोड़ की लागत से विद्युत शवदाह का गृह का निर्माण गत वर्ष फरवरी में शुरू हुआ था। जिसके लिए नगर विकास विभाग ने नगर निगम को 1.56 करोड़ रुपये आवंटित किया था। नगर विकास विभाग ने बुडको को आवंटित दूसरे फेज की राशि आवंटित नहीं की है। शवदाह का निर्माण सुमन इंटरप्राइजेज ने शेष राशि भुगतान को लेकर काम ठप कर दिया है। जबकि बरारी में 90 फीसद तक कार्य पूर्ण हो चुका है।

बरारी में यह है कार्य बाकी : बिजली कनेक्शन, फर्निस बायरिंग, पैनल का कार्य, रोशनी बाहरी परिसर का पक्कीकरण और चारदीवारी निर्माण।

होता है वायु प्रदूषण

विद्युत शवदाह गृह नहीं होने से बरारी श्मशान घाट पर दाह संस्कार करने में प्रतिदिन छह टन लकडिय़ों फूंक दिया जाता है। जिसका पर्यावरण भी असर पड़ रहा है। इससे वायु प्रदूषण के साथ गंगा पर असर पड़ रहा है। लकडिय़ों के जलने से निकलने वाली धुएं के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। इससे वायु प्रदूषण होता है तथा अपशिष्ट के रुप में निकलने वाले राख से मृदा प्रदूषण भी होता है। यह व्यवस्था उपलब्ध होते ही लकडिय़ों की कटाई पर अंकुश लगने के साथ प्रदूषण में कमी आएगी।

आधुनिक विद्युत शवदाह गृह का है फायदा

विद्युत शवदाह गृह स्क्रबर टेक्नोलॉजी से लैस होता है। जो शव जलने के दौरान निकलने वाली खतरनाक गैस और बॉडी के बर्न पार्टिकल को सोख लेता है। शव का डस्ट पार्टिल को पानी के टैंक में जमा होगा। जिससे खाद के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है।आधुनिक फर्निश संयंत्र लगा है। प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए रिप्रेंटिव संयंत्र लगाया जाएगा। शव जलने के दौरान काले रंग के धुएं को सफेद रंग में बदल देता है।

क्या कहते हैं पर्यावरण विद़

शव के जलाने के बाद गंगा में राख, जलती लकडिय़ां सहित अन्य चीजों को प्रवाहित कर दिया जाता है। जिससे जल की गुणवत्ता में क्षरण होता है। पानी में घूलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जिससे जलीय जीवों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यूं कहे कि गंदगी के कारण पानी की खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है। इसकी उत्पादकता में कमी होना सेहत के लिए खतरनाक है। - प्रो. सुनील चौधरी, पर्यावरण विद्

एक स्वस्थ पेड़ हर दिन लगभग 230 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे सात लोगों को प्राण वायु मिलती है। यदि हम इसके आसपास कचरा जलाते हैं तो इसकी ऑक्सीजन उत्सर्जित करने की क्षमता आधी हो जाती है। इस तरह हम तीन लोगों से उसकी जिंदगी छीन लेते हैं। आज पेड़ों की कटाई पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। इसलिए पौधे लगाने के साथ-साथ हमें पेड़ों को बचाने की जरूरत है। इसके लिए हमें जागरूक होने की जरूरत है। अपने आसपास पेड़ों को न कटने दें, उसका विरोध करें। - अरविंद मिश्रा, पर्यावरण विद़

शवदाह गृह का काम अंतिम चरण में है। संबंधित विभाग को इसे जल्द पूरा करने का निर्देश दिया गया है। योजना से संबंधित फाइल संबंधित शाखा से मांगी जाएगी। निर्माण में अगर आवंटन की समस्या होगी तो शीघ्र दूर की जाएगी। - जे. प्रियदर्शिनी, नगर आयुक्त

संवेदक को शेष कार्य जल्द पूरा करने का निर्देश दिया गया है। बकाए राशि आवंटन की मांग की गई है। शव़दाह गृह जल्द काम करने लगेगा। छह माह से संवेदक ने आवंटन के अभाव में कार्य बंद रखा है। विभाग को पत्राचार कर समस्या से अवगत कराया गया है। साथ ही आवंटन की मांग की गई है। - संतोष मौर्या, कार्यपालक अभियंता, बुडको

भागलपुर में शहदाव गृह का कार्य 90 फीसद पूरा हो गया है। चार दिवारी का काम बाकी है। एक माह में शहदाह गृह चालू हो जाएगा। - चंद्रभूषण कुमार, पीआरओ बुडको

मुंगेर, मोकामा, सोनपुर और भागलपुर में छह माह से विद्युत शवदाह गृह निर्माण का कार्य आवंटन नहीं मिलने से बंद कर दिए है। विभाग अगर राशि दें तो 10 दिनों में कार्य पूर्ण कर हैंडओवर कर देंगे। - सुजीत कुमार, संवेदक

Posted By: Dilip Shukla

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