कटिहार, मनीष सिंह। मेहंदी रचा के रखना, डोली सजा के रखना..., बरात दुल्हन के दरवाजे आ रही हो तो युवा आज भी इस गाने पर खूब कमर मटकाते हैं। लोक परंपरा में जब यही डोली चलन में थी तो चलो रे डोली उठाओ कहार...जैसे गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए। कार-जीप आदि वाहनों से विदाई आम बात हो गई तो वक्त के साथ डोली भी विदा हो गई, लेकिन कहीं-कहीं आज भी इसकी परंपरा दशकों पुराने दौर का मीठा अहसास करा जाती है। बिहार के कटिहार जिले में अमदाबाद प्रखंड के कुछ गांवों में बेटियां आज भी डोली पर ही विदा होती हैं और बहुएं भी डोली से ही उतरती हैं।

आधा दर्जन गांवों में है डोली बनाने वाले

गंगा की गोद में बसे अमदाबाद प्रखंड के आधा दर्जन गांवों में डोली (पालकी) उठाने वाले भी हैं, बनाने वाले भी। उनकी समाज में काफी इज्जत है। उनका पेशा ही कुछ ऐसा है, क्योंकि उस डोली से गांव की बेटी की भावनाएं जुड़ी होती हैं और डोली उठाने वालों से एक सामाजिक रिश्ता। इस इलाके में बाढ़ की त्रासदी भी रहती है। शादियां भी अमूमन 30-40 किलोमीटर की दूरी पर ही होती हैं, सो बेटी-बहू डोली से ही ससुराल पहुंचती है। इससे ज्यादा दूरी हो तो वाहन का विकल्प है, पर घर से सड़क तक डोली ही जाएगी।

पूर्वजों से चली आ रही परंपरा

प्रखंड के रतन टोला, भगवान टोला, बदन टोला, दीनाराम टोला सहित आधा दर्जन गांवों में यह परंपरा आज भी बरकरार है। चौसाठ बंगाल, कुम्हार, कर्मकार से लेकर इन गांवों में बसने वाले अन्य जाति के लोग भी इस परंपरा के वाहक हैं। लेकिन अब इस पर किसी जाति विशेष का क्षेत्राधिकार नहीं रहा। स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्वजों से चली आ रही परंपरा लोक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है, जिसे बरकरार रखा है।

कई डोलियां पुश्तैनी भी

मुख्य रूप से चौकिया पहाड़पुर कर्मकार टोला, बदनटोला में डोली बनाई जाती है। वैसे आसपास के गांवों के कुछ लोग भी इस पेशे में हैं। कई डोलियां पुश्तैनी भी हैं। लग्न का समय आने से पहले इसकी साज-सज्जा कर ली जाती है। डोली उठाने वाले भी किसी खास जाति के नहीं होते हैं। कई जातियों के लोग समूह में यह काम करते हैं।

समूह में होते हैं 20 लोग

बदन टोला के संजय मंडल, शंकर ऋषि, शिबू मंडल और अमर मंडल ने बताया कि करीब 30 वर्ष पूर्व उनके परिवार के लोगों ने डोली बनाई थी। उस समय डोली उठाने के लिए उनका एक दल हुआ करता था। गांवों की कितनी ही बेटियां इसी डोली पर ससुराल विदा हुईं। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में डोली उठाने वालों का अलग-अलग समूह है। इसमें करीब 20 लोग होते हैं। जितने सदस्य डोली लेकर जाते हैं, उनमें तय राशि बराबर में बांट दी जाती है। 10 प्रतिशत राशि डोली की मरम्मत के लिए रख ली जाती है। राशि क्या होगी, यह कुछ तय नहीं है। गांव-समाज की बात है, जो मिल गया सब ठीक है। न्यूनतम 11 हजार तो मिल ही जाता है।

बुजुर्ग कहते हैं, डोली प्रतिष्ठा है

बुजुर्ग रामपति सिंह, रामदेव सिंह, राम दयाल सिंह, उत्तम मंडल आदि ने बताया कि पहले साधन-संपन्न परिवारों के यहां से डोली निकलती थी। धीरे-धीरे यह परंपरा आम हो गई। गांव-समाज के लोग जब बेटी को डोली पर बिठाकर विदा करते हैं तो वह दृश्य बहुत भावुक कर देने वाला होता है। अब सड़कें भी बन गई हैं, पर डोली को नहीं छोड़ सकते।

डोली से नहीं आने पर उलाहना भी

अपने मायके से डोली में बैठकर अपने पति अनिल सिंह के घर भगवान टोला पहुंचीं अहिल्या देवी कहती हैं, यह सबकी प्रतिष्ठा से जुड़ा है। पिता बेटी को डोली से नहीं भेजे तो ससुराल में उलाहना मिलने लगता है। वे अपनी विदाई के दिन को याद करते हुए बताती हैं कि मायका छूट रहा था, मैं डोली पर थी। गांव-समाज को निहारते आंखों में आंसू लिए गुजरने का वह मीठा अहसास आज भी रोमांचित कर देता है। कोसी क्षेत्र के जाने-माने गीतकार भगवान प्रलय ने शायद इन्हीं अहसासों पर लिखा है-धीरे-धीरे उठाओ रे डोलिया, देखि लेबै बाबा के बहियार...। डोली जरा धीरे-धीरे लेकर चलो, मैं अपने पिता के खेत-खलिहान तो जी भर कर देख लूं...।

 

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