भागलपुर [शंकर दयाल मिश्रा]। तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर...। शैलेंद्र की कविता की यह पंक्तियां भागलपुर सिटी कोविड सेंटर में मौजू है। कोरोना संक्रमितों को ठहराए जाने वाली यहां की बिल्‍डिंगों में मरीज सुबह-सबेरे से ही स्वर्ग को उतारने की कोशिशें शुरू कर देते हैं। यहां पर प्रवास कर रहे अधिकतर मरीजों की सुबह बरामदे में टहलने और योग-प्रणायाम से शुरू होती है। नजारा ऐसा मानों सैंडिस कंपाउंड मैदान के ट्रैक पर लोग दौड़ लगा रहे हों। सरपट भाग-भागकर पसीने से भर चुका एकचारी का एक छरछरा सांवला युवक कहता है मेरे भाई फौज में है। मैं भी इस बार मैट्रिक की परीक्षा दूंगा। इसके बाद फौज में जाऊंगा।

बिल्‍डिंग 3 के प्रथम तल पर दक्षिणी सीढ़ी की ओर से बायीं ओर पहले रूम में एक फौजी अपनी पांच वर्षीय बिटिया के साथ आइसोलेशन पर हैं। दो हफ्ते पहले फौजी की कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। उनका सात-आठ वर्ष का बेटा भी पॉजिटिव पाया गया था। आइसोलेशन पीरियड व्यतीत कर जिस दिन घर जाते उसके दो दिन पहले बिटिया की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। अब बेटा घर जा चुका है और फौजी अपनी बिटिया के लिए रुक गए हैं। फौजी की दिनचर्या और बिटिया की सेवा यहां के अन्य मरीजों को संबल देता है, जिंदगी की जीत में यकीन पैदा कराता है। चूंकि बिल्‍डिंग 3 में सफाई-सैनिटाइजेशन नहीं के बराबर है, फौजी सुबह होते ही सबसे पहले अपने कमरे में झाड़ू लगाते देखे जा सकते हैं। यह फूल झाड़ू उन्होंने किसी को पैसे देकर मंगाया है। फौजी के झाड़ू लगाने के बाद अगल-बगल के कमरे में रहने वाले लोग उनसे झाड़ू मांगकर ले जाते हैं। इसके बाद फौजी बरामदे में टहलने लगते हैं। उनके पीछे-पीछे मास्क लगाए उनकी गुडिय़ा सी दिखने वाली बिटिया भी टहलने लगती है। उन्मुक्त और कोरोना से निडर। यह नजारा यहां अद्भुत होता है। बाप-बेटी के टहलने का यह अंदाज लोगों के अंदर पनपी निराशा और अकेलेपन को कुछ देर के लिए खत्म करता है।

भागलपुर शहरी क्षेत्र के एक बुजुर्ग मरीज तो इस नजारे को देखने के लिए बरामदे के एक किनारे में नियमित रूप से खड़े रहते हैं। वे कहते हैं कि तीन दिन पहले बेटा मर गया, कोरोना के कारण। अभी बहू और पोती के साथ यहां आइसोलेशन सेंटर में लाए गए हैं। बेटे की मौत के बाद समाज ने ऐसा अछूत बनाया और ऐसी नजरों से देखा जैसे हमने कोई बहुत बड़ा गुनाह या पाप कर दिया हो। समाज की उस उपेक्षा से जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई थी। यहां आए हैं तो हमें कोई अछूत नहीं समझ रहा। शायद इसलिए कि यहां हमारा अलग परिवार बन जाता है, कोरोना परिवार। यहां इन बाप-बेटी का जिंदगी के प्रति यकीन देखकर जीने का संबल मिल जाता है। हालांकि फौजी कहते हैं, बहुत दिन हो गए। अब मन उब रहा है यहां।

दो कैटोगरी में बांटे गए हैं मरीज

यहां पर मरीजों को भी दो कैटोगरी में बांट दिया गया है। सीरियस या माइल्ड लक्षण वाली कैटोगरी नहीं, बल्कि वीआइपी और जेनरल कैटोगरी में। वीआइपी किस्म के मरीजों को एक नंबर बिल्‍डिंग में ठहराया जाता है। इसमें सफाई और सैनिटाइजेशन की नियमित व्यवस्था है। बाकी जेनरल कैटोगरी के मरीजों को तीन नंबर बिल्‍डिंग में। 

वैसे, यहां मरीजों को आइसोलेट करने के लिए तीन बिल्‍डिंग चिह्नित हैं। व्यवस्था से जुड़े लोगों ने बताया कि बिल्‍डिंग नंबर 2 में पानी की समस्या है। बोरिंग खराब है। कई दफे सदर अस्पताल प्रशासन को जानकारी दी गई है, लेकिन इसे ठीक करने के लिए कोई नहीं आता। इसलिए यहां की दो बिल्‍डिंगों एक और तीन में ही लोगों को ठहराया जाता है।

 

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