भागलपुर [आनंद कुमार सिंह]। कोरोना संक्रमण को लेकर लॉकडाउन ने गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़कर रख दी। कई कर्ज में चले गए तो कई दाने-दाने को मोहताज हैं। इतनी परेशानियां झेलने के बावजूद, अधिसंख्य का यही कहना है कि मोदी सरकार ने देश को बचाने के लिए सही समय पर लॉकडाउन का फैसला ले लिया।

अनलॉक वन से एक दिन पहले, बरारी के पास प्रभाकर साह और कोमल देवी रात में अपना ठेला तैयार कर रहे थे। ये भूंजा, अचार आदि बेचते हैं। नवगछिया में अपनी जमीन है, लेकिन मकान नहीं। जमीन पर भी कई लोग विवाद कर रहे हैं। गंगानगर के पास ये दो हजार रुपये महीने में फूस की झोपड़ी में किराया लेकर रहते हैं।

इकलौती बेटी प्रियंका सुंदरवती महिला कॉलेज से बीए कर रही है। उसकी ट्यूशन में हजार रुपये महीने खर्च होते हैं। दोनों पति-पत्नी की चाहत है कि बेटी पढ़-लिखकर कुछ बेहतर कर ले, अच्छे घर में उसकी शादी हो जाए। प्रभाकर के पैर में साइटिका का दर्द रहता है, सो पत्नी कोमल ठेला खींचने में उनकी मदद करती है। लॉकडाउन के दौरान इनका काम बंद हो गया। पहले पूंजी बेच दी, फिर तीन रुपये प्रति सैकड़ा पर तीस हजार रुपये का कर्ज लिया। 20 हजार रुपये खाने-पीने में खर्च हो गए। 10 हजार रुपये से काम शुरू करने की तैयारी की। इनका कहना है कि लॉकडाउन से पूर्व हजार से 1200 रुपये तक का सामान बिकता था। दो-ढाई सौ रुपये बच जाते थे। अब मुश्किल से तीन-चार सौ रुपये की बिक्री हो रही है और 70-80 रुपये बच रहे हैं। लोगों के पास पैसे नहीं हैं तो बिक्री कहां से हो। दो लोगों का मेहनताना भी नहीं निकल पा रहा है। परिवार चलाने में काफी परेशानी हो रही है। इनका राशन कार्ड भी नहीं बन पाया। कहा गया कि जहां के निवासी हैं, वहां ही राशन कार्ड बनेगा। इतनी तकलीफें झेलने के बावजूद ये नरेंद्र मोदी सरकार के लॉकडाउन के फैसले को सही बताते हैं। कहते हैं कि अब लॉकडाउन में लिए गए कर्ज का भुगतान करने में काफी समय निकल जाएगा। जिंदगी सामान्य होने में अभी वक्त लगेगा।

Posted By: Dilip Shukla

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