भागलपुर, जेएनएन। राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा की राह अब कोरोना के कांटे रोक रहे हैं। हर साल भागलपुर सहित पूर्व बिहार के जिलों से करीब 10 हजार बच्चे वहां इंजीनियरिंग एवं मेडिकल की तैयारी करने जाते हैं। कोटा के बेहतर संस्थानों में एक छात्र को प्रतिवर्ष सवा लाख रुपये का शुल्क देना होता है। रहने और खाने में औसतन प्रति माह 15 हजार रुपये खर्च होते हैं।

सालाना तीन अरब रुपये देता है पूर्व बिहार

एक साल में एक छात्र कोटा में तीन लाख रुपये से अधिक खर्च करता है। 10 हजार छात्रों के खर्च पर नजर डालें तो यह आंकड़ा तीन अरब रुपये तक पहुंच जाता है। ऐसे में छात्रों के लौटने के बाद ये तीन अरब रुपये कोटा ना जाकर पूर्व बिहार में ही रहेंगे। कोरोना संक्रमण के डर से अभिभावक भी अपने बच्चों को बाहर नहीं भेजना चाह रहे हैं।

लॉकडाउन में हुए परेशान

इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रयोगशाला सहायक राजहंस आनंद कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान बच्चों के वहां फंसे रहने से उन्हें काफी मानसिक परेशानी उठानी पड़ी। बच्चे भी परेशान रहे। अब उन्होंने बच्चे को कोटा नहीं भेजने का निर्णय लिया है। छात्र आशीष ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान मेस में खाना तक मिलना बंद हो गया था।

घर पर ही करेंगे पढ़ाई

अपनी दो बेटियों सृष्टि और तान्या को कोटा में मेडिकल की कोचिंग कराने वाले विमल कुमार मिश्रा ने बताया कि कोटा में अच्छी पढ़ाई होती थी, लेकिन कोरोना ने उनके मन में भय पैदा कर दिया है। कब यह बीमारी रुकेगी, कहना मुश्किल है। ऐसे में वह बच्चों को घर पर ही ऑनलाइन पढ़ाई करवाएंगे। सृष्टि और तान्या ने कहा कि घर पर ही तैयारी करना बेहतर विकल्प है।

कोटा शिक्षा की मंडी जैसी है। वहां अच्छे शिक्षक पढ़ाते थे, इस कारण छात्र भी वहां गए। लॉकडाउन के दौरान छात्रों के साथ-साथ शिक्षक भी राज्य में लौटे हैं। ऐसे में कोटा से लौटे कई शिक्षक भागलपुर में ही छात्रों को मेडिकल-इंजीनियङ्क्षरग की तैयारी करवाएंगे। यहां बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा। उन्हें माता-पिता का सानिध्य मिलेगा और कोटा की तुलना में खर्च भी कम होगा। - ई. वाचस्पति झा, निदेशक, वीजे सचदेवा कोचिंग संस्थान

यहां के बच्चे बाहरी दुनिया को देखना चाहते हैं। वहां बेहतर पढ़ाई की सुविधा मिलने की उम्मीद रहती है। कुछ हद तक वहां की की व्यवस्था भी अच्छी रहती है। यहां के शिक्षकों को लेकर छात्रों में संशय की स्थिति रहती है। यहां और कोटा के शुल्क में ज्यादा अंतर नहीं है। लॉजिंग-फूडिंग की व्यवस्था वहां अच्छी है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के बच्चे कोटा जाते हैं, लेकिन रिजल्ट अधिक अच्छा नहीं होता है। कोटा का चार फीसद रिजल्ट है और राष्ट्रीय स्तर पर ढाई फीसद। डेढ़ फीसद वहां का रिजल्ट ज्यादा है। एक हजार में मात्र 15 बच्चे इंजीनियङ्क्षरग में सफल हो पाते हैं। शेष 985 बच्चे बैरंग वापस आते हैं। - ई. अंशु सिंह, निदेशक, टेक्नो मिशन

Posted By: Dilip Shukla

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