भागलपुर [जेएनएन]। जम्मू कश्मीर के हंदवाड़ा एलओसी पर बीएसएफ के आठ बटालियन में हेड कांस्टेबल के रूप में तैनात मु. इबरार खान की सर्पदंश से मौत हो गई। वे मूलरूप से हबीबपुर इलाके के मौअज्जमचक के रहने वाले हैं। मंगलवार देर रात उनका पार्थिव शरीर दिल्ली उनके आवास पर पहुंचा। बेटे मु. राजा के मुताबिक ड्यूटी खत्म होने के बाद 14 अगस्त को जब पिता अपने बंकर में सोए। तभी जहरीले सांप ने उनके दाहिने हाथ के उंगली में काट लिया। उन्हें बेहतर इलाज के लिए दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज में के दौरान ही आठ सितंबर को उनकी मौत हो गई।

परिवार वाले थे साथ

इबरार की मौत होते ही उनके परिवार में मातम का माहौल हो गया। उन्हें दो बेटे व दो बेटियां हैं। घर में वे एकलौते कमाने वाले थे। अब तक बस एक ही बेटी की वे शादी कर पाए हैं। इबरार के मौत की जानकारी मिलते ही आसपास से भी काफी संख्या में लोग उनके परिवार को सांत्वना देने उनके घर पहुंचे। सेना के जवान उनके पार्थिव शरीर को लेकर हबीबपुर पहुंचे। घर पहुंचने पर काफी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलि दी। इसके बाद जनाजे की नमाज के बाद इबरार के पार्थिव शरीर को गनीचक स्थित कब्रिस्तान में ही सलामी दी गई। इसके बाद शव को दफना दिया गया।

1997-1999 के बीच 'ऑपरेशन विजय' में लिया था हिस्सा

परिजनों के मुताबिक इबरार काफी साहसी थी। उन्होंने 1997 से 1999 के बीच हुए 'ऑपरेशन विजयÓ कारगिल युद्ध में भी बहादुरी से हिस्सा लिया था। 'ऑपरेशन विजय' में दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए उन्हें बीएसएफ के बटालियन आठ के कमाडिंग ऑफिसर की तरफ से प्रशस्ति पत्र भी दिया गया था। जिस समय कारगिल युद्ध छिड़ा था, इबरार की कारगिल में एक कठिन इलाके में तैनात थी। पार्थिव शरीर को कंधा देने के लिए हबीबपुर इंस्पेक्टर मु. इनामुल्ला, जगदीशपुर सीओ सोनू घोष समेत अन्य लोग शामिल थे।

बेटे ने कहा, पिता के जनाजे में शामिल नहीं हुए कोई अधिकारी

इबरार के बेटे मु. राजा ने कहा कि उनके पिता की मौत पर उचित सम्मान नहीं मिला। जिलों के आलाधिकारियों या किसी नेता ने भी उनके परिवार का हालचाल नहीं लिया और ना ही जनाजे में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि सरकार से भी उन्हें किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं दी गई।

Posted By: Dilip Shukla

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