भागलपुर। श्रावण शुक्ल सप्तमी पर मंगलवार को उत्तरवाहिनी गंगा के विभिन्न घाटों से सवा लाख कावरियों ने पवित्र गंगा जल अपने कावरों में लेकर कामना ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ के जलाभिषेक के लिए पैदल प्रस्थान किया। लघु भारत का दर्शन कराता यह कावरिया मेला अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। कावरियों की पदयात्रा जारी है। चौबीस घटे गंगा में स्नान वैदिक रीति से शुद्ध न होते हुए भी प्रसाशनिक दवाब में लगभग एक दशक से जारी है। कावरियों के ठहराव की कहीं कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण जिला प्रशासन ने वर्ष 2000 में यह नयी परंपरा शुरू करा दी थी कि कावरिया पूरी रात गंगा में स्नान कर प्रस्थान करता रहे। इससे पूर्व तक मध्य रात्रि में 12 से दो बजे तक गंगा में प्रवेश वर्जित था।

धार्मिक यात्रा में धर्म की हो रही उपेक्षा

एक ओर तो गंगा को देवनदी बता कर उसके जल को ही भगवान शिव के लिए सर्वप्रिय मान कर देश भर के लोग यहा से कावर यात्रा में पैदल चलने का कष्ट सह उठाते हैं। दूसरी ओर इस परंपरा को ही ताक पर रख रहे हैं कि देव, देविया संध्या आरती के बाद शयन के लिए विश्राम में चले जाते हैं । इतनी ही भीड़ देवघर मंदिर में जलाभिषेक के लिए पहुंचती है। लेकिन वहा स्थापित परंपराओं को तोड़ कर पूरी रात दर्शन पूजन की सुविधा नहीं दी गई। लेकिन यहा आने वाले पदाधिकारियों ने अपने अपने समय में अपनी सुविधानुसार नियमों को बनाया तोड़ा। मा गंगा की आरती के बाद गंगा में प्रवेश एवं कावर की पूजा 1998 तक पूरी तरह वर्जित रही। प्रशासन ने भी इसे सख्ती से लागू कराने में सक्त्रियता दिखाई। आरती के समय गंगा में सुरक्षा नौका को भी जो जहा की स्थिति में प्रशासन ही स्थिर करा देता था। बाद में नया आदेश आया कि गंगा की आरती बाद रात दस बजे तक ही स्नान पूजन करा सकते हैं। फिर सुबह चार बजे से पूजा शुरु होती थी। एक ही वर्ष बाद केवल मध्य रात्रि से दो बजे तक वर्जित किया गया। और अब 24 घटे ।

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