आनलाइन डेस्क, भागलपुर। बदलाव शतत् चलने वाली प्रक्रिया है। ये लाइनें यूनिवर्सल ट्रुथ हैं। इंसान का जन्म इसी बदलाव के अधीन हुआ और  जीवन शैली  भी इसी बदलाव की तरह दिन पर दिन बदलती गई। यहां बदलाव के 'ब' (B) की बात कर पुरा पषाण काल में नहीं जाएंगे। यहां हम चुनावों में हुए बदलाव की बात करेंगे। B-बैलेट से शुरू हुए B-बायोमेट्रिक तक पहुंचे मतदान प्रक्रिया की। बिहार पंचायत चुनाव (Bihar Panchayat Election) इस बार हाईटेक तरीके से हो रहे हैं। हालांकि, कई जगह इस व्यवस्था से दो-चार भी होना पड़ रहा है लेकिन पारदर्शिता के खातिर चुनावों में हुए बदलाव ने आधुनिक क्रांति पर चार चांद लगाने शुरू कर दिए हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में चुनाव इस दहलीज तक पहुंचेंगे शायद ही किसी ने सोचा हो।

'B' से 'B' तक 

मुंगेर के धरहरा प्रखंड अंतर्गत बाहाचौकी गांव की स्वतंत्रता सेनानी स्व. बाजो महतो की धर्म पत्नि बुजुर्ग मतदाता 92 वर्षीय सरयुग देवी अपनी यादें ताजा करते हुए कहती हैं, ' देश में पहली बार पंचायती चुनाव 1952 में हुए। गांव की सरकार चुनने का यह पहला मौका था, जब गांव से ही कोई हमारा मुखिया बनता था। तब इतना शोरगुल नहीं होता था। अपने पति के साथ उच्च विद्यालय सुंदरपुर में पहला पंचायत चुनाव जब हुआ तो वोट डालने पहुंची थी।'

अपनी लड़खड़ाती जुबान से दादी कहती हैं कि तब इतना ताम-झाम नहीं होता था, जितना अब के जमाने में हो रहा है। गांव के एक चौकीदार को मतदान केन्द्र पर रख मुखिया का चुनाव हो जाता था। तब और अब में जमीन-आसमान का फर्क नजर आता है। लगभग 80 के दशक के बाद के मुखिया चुनाव में मार-पीट, बूथ लूट, की घटना होने लगी थी। पहले हार-जीत के बाद दुश्मनी नहीं होती थी। अब वो समय कहां रहा।

सरयुग देवी ने जो कहा वो बी से बी तक के सफर के बदलाव के पीछे की मुख्य जड़ है। बैलेट पेपर पर लगने वाली मुहर और कास्ट किया जाने वाला वोट, आज बायोमेट्रिक तक पहुंच गया है। देश में पहले चुनाव में मतदान पेटियां होती थीं, इन्हीं में अपने मनपसंद प्रत्याशी के नाम पर मुहर लगा वोट डाला जाता था।

ईवीएम और विवाद 

यूं तो ईवीएम (Electronic Voting Machine) का अविष्कार साल 1980 में एमबी हनीफा ने किया। इसका पंजीकरण 15 अक्तूबर 1980 को कराया। इसके बाद देश में ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल मई 1982 में केरल विधानसभा चुनावों में हुआ। यहां के परावुर विधानसभा  50 मतदान केंद्रों पर इसका इस्तेमाल किया गया। इसी चुनाव से ईवीएम पर आरोप का सिलसिला भी शुरू हो गया था, जब एक उम्मीदवार ने अपनी हार का कारण इस मशीन के माथे मढ़ दिया।

चौथे बदलाव के साथ बिहार में पहली बार ईवीएम से पंचायत चुनाव

1951-52 से लेकर 2021 तक के चुनावी सफर में मतदान की प्रक्रिया में इस बार पंचायत चुनाव में चौथा बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यूं तो लोकसभा चुनाव 2004 से देशभर में इस मशीन का प्रयोग किया गया। इस मशीन के साथ वीवीपैट 2019 में आई। अब बिहार में ये पहला मौका है जब बिहार में पंचायत चुनाव ईवीएम से कराया जा रहा है। चौथा बदलाव बायोमेट्रिक है। 

बिहार में बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं

बिहार के नाम पहली बूथ कैप्चरिंग की घटना दर्ज है। यहां बेगूसराय में 1957 में पहली बार आम चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की घटना को अंजाम दिया गया। जिले के मटिहानी विधानसभा सीट पर चल रहे चुनाव के दौरान रचियाही गांव में बूथ पर कब्जा कर आजाद भारत में पहली बार बूथ कैप्चरिंग हुई। इसके बाद ये शब्द 1970 इस शब्द ने लोकतंत्र के त्योहार पर हमला करना शुरू कर दिया। इसके बाद 1990 में जब टीएन शेषन ने बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला, तब उन्होंने बिहार में बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं पर रोकथाम लगाने के लिए मानों कसम ले ली हो।

1991 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव के दौरान बिहार में बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग हुई, टीएन शेषन ने इसपर कार्रवाई करते हुए पटना लोकसभा का चुनाव रद्द कर दिया। ये बूथ कैप्चरिंग पर लगाम लगाने के लिए उनका बड़ा एक्शन माना जाता है। इसके बाद उन्होंने आदेश दिया कि अब चुनाव तब ही होंगे जब अर्द्धसैनिक बल तैनात होगा। यही वजह रही कि बिहार में चार बार वोटिंग टाली गई। एक सप्ताह तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा। इसके बाद ईवीएम ने मानों नए चुनावों की लहर ला दी। हालांकि, बिहार से कई बार विरोध के दौरान ईवीएम को तोड़े जाने की खबरें भी सामने आती रहीं हैं।

(बायोमेट्रिक का प्रयोग करते पोलिंग एजेंट) 

ताकि, बोगस वोटिंग पर लगे रोकथाम 

इस बार चुनाव में बायोमेट्रिक का इंतजाम इसलिए ही किया गया है ताकि अराजकतत्व बोगस वोटिंग न कर सकें। पहले जहां चुनाव के बाद स्याही से उंगली पर निशान लगाया जाता था अबकि उस प्रक्रिया के साथ-साथ मतदाताओं की बायोमेट्रिक उपस्थिति भी दर्ज करायी जा रही है। अपना वोट कास्ट कर यदि कोई वापस पोलिंग बूथ पर पहुंचता भी है तो उसकी पकड़ मौके पर कर ली जाएगी। 

Edited By: Shivam Bajpai