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हर 4 महीने में खून की दरकार, सफेद पड़ा जिस्म! दुर्लभ बीमारी से जूझ रही उफ्क, JLNMCH भागलपुर में बयां की दर्दनाक दास्तान

Published: Fri, 23 Oct 2026 10:00 AM (IST)

Bhagalpur JLNMCH Rare Disease ITP: भागलपुर के जेएलएनएमसीएच में 12 वर्षीय उफ्क परवीन दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी ITP से जूझ रही ...और पढ़ें

Bhagalpur JLNMCH Rare Disease ITP: जेएलएनएमसीएच में दुर्लभ बीमारी से जूझ रही 12 वर्षीय उफ्क परवीन

Bhagalpur JLNMCH Rare Disease ITP: जेएलएनएमसीएच में दुर्लभ बीमारी से जूझ रही 12 वर्षीय उफ्क परवीन

HighLights

  1. 12 वर्षीय उफ्क ITP नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित।

  2. हर चार महीने में खून और प्लेटलेट्स की जरूरत।

  3. ITP मरीजों के लिए विशेष ब्लड कार्ड की मांग।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Bhagalpur JLNMCH Rare Disease ITP: भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) के मेडिसिन वार्ड में दाखिल होते ही एक बेड पर लेटी 12 वर्ष की बच्ची अनायास ही हर आने-जाने वाले का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। मासूम की आंखें खुली हैं, लेकिन चेहरा और समूचा बदन खून की भीषण कमी के कारण बिल्कुल सफेद पड़ चुका है।

सिरहाने बुर्के में आंसुओं को थामे बैठी एक बेबस मां और वहीं खड़े होकर दवाओं व जांच की पर्चियां देख रहे एक शिखाधारी शख्स। यह बच्ची है नवगछिया की 12 वर्षीय उफ्क परवीन, जो दुर्लभ आटोइम्यून बीमारी आइटीपी (इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपीनिया) के कारण जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है।

बुर्के में बैठी महिला उफ्क की मां आरफीन हैं और उनकी मदद में दिन-रात खड़े शिखाधारी व्यक्ति स्थानीय समाजसेवी सुजीत कुमार झा हैं। धर्म और पहचान के प्रतीक भले ही जुदा हों, लेकिन दोनों के दिलों में सिर्फ एक ही तड़प है—मासूम उफ्क की सांसों को बचाना।

अस्पताल के इस वार्ड में धर्म की सीमाएं मिट चुकी हैं और इंसानियत का रिश्ता सबसे बड़ा संबल बनकर उभरा है। सुजीत झा बताते हैं कि वे किसी अन्य काम से अस्पताल आए थे, लेकिन जब इस बेबस मां और बच्ची को देखा, तो उसकी जान बचाना ही उनका पहला मानवीय कर्तव्य बन गया।

अपने ही जिस्म से लड़ रही जंग

उफ्क किसी बाहरी दुश्मन या संक्रमण से नहीं, बल्कि अपने ही शरीर के भीतर हो रहे आत्मघाती हमले से जंग लड़ रही है। जिस उम्र में बच्चों के कदमों में तितलियों के पीछे भागने की चपलता और उछलकूद होनी चाहिए, उस उम्र में उफ्क के लिए चंद कदम चलकर मां की आगोश में समाना भी किसी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ने जैसा कष्टकारी हो गया है।

तितलियों की उम्र में बिस्तर पर लाचार

रक्त की भारी कमी से उसके कोमल बदन की रंगत उड़ चुकी है और शरीर में जगह-जगह मांस की दर्दनाक गांठें उभर आई हैं। इस आटोइम्यून बीमारी के चलते उसका सुरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) ही उसके जीवन-रक्षक प्लेटलेट्स को निगल रहा है। मासूम की जिंदगी हर चार महीने की मोहलत पर टिकी है। बाहर से खून और प्लेटलेट्स चढ़ जाएं तो कुछ दिन सांसें सुचारु चलती हैं, वर्ना शरीर बेजान होकर ढहने लगता है।

एम्स में दो महीने जांच के बाद भी बेअसर हुईं दवाएं

मां आरफीन ने रुंधे गले से बताया कि उफ्क जब महज सात साल की थी, तब पहली बार इस बीमारी का पता चला था। स्थिति बिगड़ने पर वे उसे देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थान एम्स नई दिल्ली ले गईं। वहां दो महीने तक गहन जांच हुई और प्लेटलेट्स बढ़ाने की नियमित दवाएं शुरू की गईं। शुरुआत में कुछ सुधार दिखा, लेकिन समय के साथ दवाओं ने काम करना बंद कर दिया।

अब हालत यह है कि रक्त और प्लेटलेट्स चढ़ने के बाद चार-पांच महीने किसी तरह बीतते हैं, फिर वही भयावह चक्र शुरू हो जाता है। अत्यंत निर्धन परिवार के लिए हर चौथे महीने नए ब्लड डोनर की तलाश करना किसी पहाड़ तोड़ने से कम नहीं है।

अस्पताल प्रशासन का मानवीय रुख, पर नियम आड़े

अस्पताल के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. अजय प्रताप ने बताया कि मौजूदा सरकारी नियमों के अनुसार आइटीपी मरीजों के लिए अलग से विशेष ब्लड कार्ड जारी करने का कोई प्रावधान नहीं है। सामान्य व्यवस्था के तहत खून के बदले ही खून और प्लेटलेट्स दिए जाते हैं। हालांकि बच्ची की नाजुक स्थिति को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाई और तुरंत रक्त व प्लेटलेट्स की व्यवस्था कराई।

वहीं, मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. राजकुमार चौधरी ने बताया कि बच्ची की पैथोलॉजिकल जांच कराई गई है। खून तो बढ़ा है, लेकिन प्लेटलेट्स का स्तर अब भी बेहद कम बना हुआ है। शुक्रवार को दोबारा जांच की जाएगी। यदि पेट के भीतर रक्तस्राव (इंटरनल ब्लीडिंग) हुआ होगा तो उसे निकालने का प्रयास किया जाएगा। हालत में सुधार न होने पर बच्ची को उच्चतर केंद्र रेफर किया जाएगा।

थैलेसीमिया की तरह आइटीपी मरीजों को स्थायी कार्ड क्यों नहीं?

उफ्क की यह मूक बेबसी समूची स्वास्थ्य व्यवस्था और नीति-निर्माताओं के सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा करती है। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए तो सरकार की ओर से विशेष ब्लड कार्ड और बिना डोनर के रक्त उपलब्ध कराने की राहत मौजूद है, लेकिन आइटीपी जैसी दुर्लभ और जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे असाध्य मरीजों के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है।

हर चार महीने पर डोनर खोजना गरीब परिवारों की कमर तोड़ देता है। इसी जमीनी हकीकत को देखते हुए समाजसेवी सुजीत कुमार झा ने अस्पताल अधीक्षक और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर उफ्क जैसी दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए विशेष 'ब्लड कार्ड' जारी करने की भावुक अपील की है, ताकि समय पर खून न मिलने से किसी मासूम की सांसों की डोर न टूटे।