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'सिंदूर ग्राम' के रूप में विकसित होगा भागलपुर का रमासी गांव, कृषि विश्वविद्यालय ने लिया गोद

Published: Tue, 21 Apr 2026 02:40 PM (IST)

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने भागलपुर के रमासी गांव को 'सिंदूर ग्राम' के रूप में विकसित करने की पहल की ...और पढ़ें

सिंदूर की खेती। फाइल फोटो

सिंदूर की खेती। फाइल फोटो

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ललन तिवारी, भागलपुर। पृथ्वी दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने जिले के रमासी गांव को ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में विकसित करने की अभिनव पहल शुरू की है। यह पहल केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं, बल्कि हरित विकास, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के सशक्त माडल के रूप में उभरने की दिशा में एक ठोस प्रयास है।

गोद लेकर विकास का संकल्प

विश्वविद्यालय ने भागलपुर जिले के सन्हौला प्रखंड अंतर्गत रमासी गांव को गोद लेकर यहां बड़े पैमाने पर सिंदूर (सीता सिंदूर) के पौधों का रोपण प्रस्तावित किया है।

प्रथम चरण में वैज्ञानिकों की टीम द्वारा सर्वेक्षण कर भूमि की उर्वरता, जलवायु की अनुकूलता तथा ग्रामीणों की सहभागिता का सूक्ष्म आकलन किया जा रहा है। यह समग्र दृष्टिकोण इस योजना को व्यवहारिक और दीर्घकालिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

महिलाओं के हाथों में हरित समृद्धि

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। विश्वविद्यालय की टीम उन्हें सिंदूर पौधों के गुण, उपयोगिता एवं आर्थिक महत्व से अवगत करा रही है।

लगभग एक हजार पौधों के रोपण की योजना है, जिसकी देखरेख गांव की महिलाएं स्वयं करेंगी। इससे न केवल उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी, बल्कि आत्मविश्वास और आर्थिक सशक्तिकरण को भी बल मिलेगा।

तीन वर्षों में फलन, बाजार से सीधा जुड़ाव

सिंदूर के पौधे तीन वर्षों में फल देने लगते हैं। इसके बीज से प्राप्त प्राकृतिक सिंदूर बाजार में अत्यंत मूल्यवान माना जाता है। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि इस उत्पाद को राष्ट्रीय स्तर के बाजार और उद्योगों से जोड़ा जाए, ताकि ग्रामीणों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।

कुटीर उद्योग का स्वरूप लेगा अभियान

यदि यह पहल सफल होती है, तो भविष्य में रमासी गांव में सिंदूर आधारित कुटीर उद्योग विकसित किया जाएगा। इससे गांव की पहचान ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में स्थापित होगी और पारंपरिक वनस्पति आधारित अर्थव्यवस्था को नया आयाम मिलेगा।

पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण

यह पहल केवल आर्थिक उन्नयन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश भी देती है। सिंदूर पौधों के रोपण से हरियाली बढ़ेगी, जैव विविधता को संबल मिलेगा और पृथ्वी को हरित आवरण से आच्छादित करने की दिशा में सार्थक कदम सिद्ध होगा।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक ने बताया कि यह देश में अपनी तरह की अनूठी पहल है, जिसमें पारंपरिक वनस्पति को आधुनिक आजीविका से जोड़ा जा रहा है। ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को इसके आर्थिक लाभ के प्रति जागरूक किया जा रहा है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

सिंदूर एक अमूल्य प्राकृतिक उत्पाद है। इसके संरक्षण और विस्तार की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में बिहार प्राकृतिक सिंदूर उत्पादन में अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित होगा। - डॉ. डी.आर. सिंह, कुलपति बीएयू सबौर भागलपुर