कचरे को बनाया खजाना : भागलपुर के युवा विज्ञानियों ने विकसित किया जादुई फिल्टर, जहरीले पानी को कहा अलविदा
भागलपुर के नवगछिया क्षेत्र के दो युवा वैज्ञानिकों ने अंडे के छिलकों से एक नैनो वाटर फिल्टर विकसित किया है। ...और पढ़ें

गांव से ग्लोबल तक: अंडे के छिलकों का नैनो फिल्टर किसानों के लिए राहत
संवाद सूत्र, नारायणपुर (भागलपुर)। भागलपुर के नवगछिया क्षेत्र के नारायणपुर प्रखंड के बलाहा गांव निवासी डॉ. अभय कुमार अमन और आशुतोष कुमार ने इस नैनो वाटर फिल्टर को विकसित किया है। खास बात यह है कि यह फिल्टर बिना बिजली के काम करता है और इसे भारत सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले इन युवाओं ने विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है।
कम लागत में तैयार हुआ प्रभावी फिल्टर
जहर बन चुके पानी को अब कचरे से बनी तकनीक साफ करेगी। भागलपुर जिले के दो युवा विज्ञानियों ने अंडे के छिलकों से ऐसा नैनो वाटर फिल्टर तैयार किया है, जो आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों को सोखकर पानी को सुरक्षित और पीने योग्य बना देता है। यह तकनीक कम लागत और ग्रामीण उपयोग के लिहाज से बेहद उपयोगी मानी जा रही है।
खतरनाक तत्वों को तेजी से करता है अवशोषित
फेंके जाने वाले अंडे के छिलकों से तैयार नैनो मटेरियल पानी में मौजूद आर्सेनिक, फ्लोराइड और लेड जैसे जहरीले तत्वों को तेजी से अवशोषित कर लेता है। साथ ही यह हानिकारक बैक्टीरिया को भी निष्क्रिय कर देता है। महंगे आरओ सिस्टम के मुकाबले यह फिल्टर सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल है।
वैज्ञानिक प्रक्रिया से तैयार होता है नैनो मटेरियल
इस तकनीक के तहत अंडे के छिलकों को पहले पाउडर बनाकर हर्बल तत्वों के साथ मिलाया जाता है। इसके बाद उच्च तापमान पर ‘कैल्सीनेशन’ प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिससे कैल्शियम कार्बोनेट नैनो कैल्शियम ऑक्साइड में बदल जाता है। यही नैनो कण पानी में मौजूद विषैले तत्वों को पकड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं।

कम लागत में ज्यादा पानी शुद्ध करने की क्षमता
यह नैनो फिल्टर बेहद किफायती है। एक किलो पाउडर बनाने में लगभग 50 रुपये की लागत आती है, जो करीब दो हजार लीटर पानी को शुद्ध कर सकता है। इस कारण यह तकनीक ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।

शिक्षा और शोध से मिली नई पहचान
डॉ. अभय कुमार अमन वर्तमान में आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना में सहायक प्राध्यापक हैं और एडवांस्ड बायो नैनो एक्सप्लोर व नैनोसपिएंस स्टार्टअप के निदेशक भी हैं। उनके साथ इस शोध में अहम भूमिका निभाने वाले आशुतोष कुमार पीएचडी शोधार्थी हैं। दोनों चाचा-भतीजा हैं और समाज के लिए उपयोगी समाधान विकसित करने में जुटे हैं।
गांव से निकलकर हासिल की बड़ी उपलब्धि
डॉ. अभय की शुरुआती शिक्षा नारायणपुर के स्कूल से हुई। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल कर विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनका मानना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में सस्ता और प्रभावी समाधान मिल सकता है।
कैल्सीनेशन की प्रक्रिया
अंडे के छिलकों के पाउडर और हर्बल रसों का गाढ़ा पेस्ट तैयार किया जाता है और पहले इसे सुखाया जाता है। इसके बाद असली कैल्सीनेशन प्रक्रिया शुरू होती है।
उच्च तापमान पर गर्म करना
सूखे हुए मिश्रण को विशेष भट्टी में हवा की मौजूदगी में उच्च तापमान पर कई घंटों तक गर्म किया जाता है। किसी ठोस पदार्थ को बिना पिघलाए, रासायनिक गुण बदलने की इस प्रक्रिया को ही कैल्सीनेशन कहते हैं।
रासायनिक बदलाव
इस प्रक्रिया में अंडे के छिलके का कैल्शियम कार्बोनेट टूटकर नैनो कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) में बदल जाता है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनकर निकल जाती है।
नैनो-कणों की विशेषताएं
- ‘नैनो’ का मतलब है कि कण का आकार बाल की मोटाई से हजारों गुना छोटा होता है।
- नैनो आकार में कणों का सतही क्षेत्रफल लाखों गुना बढ़ जाता है, जिससे पानी में मौजूद जहरीले तत्वों को चिपकाने के लिए बड़ा क्षेत्र तैयार हो जाता है।
नैनो-सीएओ (CaO) से पानी शुद्ध करने की प्रक्रिया
- फ्लोराइड हटाना : पानी में मौजूद फ्लोराइड नैनो कैल्शियम ऑक्साइड के संपर्क में आने पर कैल्शियम फ्लोराइड में बदल जाता है। यह घुलनशील नहीं होता और फिल्टर की सतह पर फंस जाता है।
- आर्सेनिक को अवशोषित करना : आर्सेनिक आयन नैनो-कणों की विशाल सतह पर मौजूद सक्रिय बिंदुओं की ओर आकर्षित होते हैं। यह रासायनिक बंधन बनाकर सतह पर चिपक जाते हैं, जिसे केमिसोर्प्शन कहते हैं।
- हानिकारक बैक्टीरिया का निष्क्रिय करना :
नैनो-कण पानी के पीएच स्तर को हल्का बदलते हैं और अपने तीखे किनारों से बैक्टीरिया की बाहरी कोशिका भित्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे वे तुरंत निष्क्रिय हो जाते हैं।
