कोई सत्तू-मूढ़ी ही पहुंचा दो! भागलपुर में राहत किचन बंद होने से तड़पे पीड़ित, तंबू में 85 साल के बुजुर्ग के छलके आंसू
Bhagalpur Flood Ground Reality: गंगा का जलस्तर घटने के बावजूद भागलपुर के अकबरनगर में बाढ़ पीड़ितों की मुश्किलें कम नहीं ...और पढ़ें

Bhagalpur Flood Ground Reality: अकबरनगर में बाढ़ का पानी घटते ही बंद हुए सामुदायिक किचन; NH-80 किनारे तंबू में मूढ़ी चबाकर दिन काट रहे 85 वर्षीय बुजुर्ग
HighLights
गंगा का जलस्तर घटने पर सामुदायिक रसोई बंद की गईं।
सैकड़ों बाढ़ पीड़ित परिवार अभी भी घरों को लौट नहीं पाए।
विस्थापित परिवार भोजन के लिए चूड़ा, मूढ़ी, सत्तू पर निर्भर।
संवाद सूत्र, अकबरनगर (भागलपुर)। Bhagalpur Flood Ground Reality: गंगा का जलस्तर घटने के साथ ही प्रशासनिक फाइलों में बाढ़ की विभीषिका भले ही कम दर्ज होने लगी हो, लेकिन जमीनी स्तर पर विस्थापित परिवारों का दर्द रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। दियारा और निचले इलाकों में स्थित रिहायशी बस्तियों में अब भी कमर भर मटमैला पानी और कीचड़ जमा है, जिसके चलते सैकड़ों परिवार अपने उजड़े आशियानों में लौटने की स्थिति में नहीं हैं।
विस्थापित परिवार राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-80) और ऊंचे बांधों के किनारे प्लास्टिक की पन्नी तानकर रहने को विवश हैं। इसी बीच अंचल प्रशासन द्वारा राहत शिविरों और बस्तियों में चल रहे सभी सामुदायिक किचनों (कम्युनिटी किचन) को एकाएक बंद कर दिए जाने से इन बेघर परिवारों के सामने दो वक्त के निवाले का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। अब चूड़ा, सूखी मूढ़ी और सत्तू घोलकर पेट भरने की मजबूरी बन गई है।
गंगा का जलस्तर घटते ही अकबरनगर व आसपास के इलाकों में बंद किए गए दर्जनों सरकारी सामुदायिक किचन; विस्थापितों के सामने भोजन का संकट
किशनपुर, खेरैहिया और इंग्लिश चिचरौंन के निचले इलाकों में अब भी जलजमाव; सैकड़ों परिवार अब भी घर लौटने में पूरी तरह असमर्थ
एनएच-80 किनारे तंबू में मवेशियों के साथ रह रहे 85 वर्षीय गणेश प्रसाद राय; हाथ में मूढ़ी और आंखों में आंसू लिए राहत की बाट जोह रहे बुजुर्ग
अंचल प्रशासन ने जलस्तर घटने का हवाला देकर बंद कराई व्यवस्था; चूड़ा, मूढ़ी और सत्तू खाकर दिन काटने को विवश हुए बाढ़ पीड़ित
बाढ़ के चरम दौर में नगर पंचायत क्षेत्र में चार, खेरैहिया में तीन, किशनपुर में दो और इंग्लिश चिचरौंन में तीन स्थानों पर अंचल प्रशासन के माध्यम से सामुदायिक किचन चलाए जा रहे थे। इसके अतिरिक्त सुदूर प्रभावित क्षेत्रों में करीब एक दर्जन अस्थायी केंद्रों पर भोजन का प्रबंध था, जिससे जरूरतमंद परिवारों को भरपेट खाना मिल जाता था। मगर पानी में मामूली गिरावट आते ही इन सभी किचनों के चूल्हे ठंडे कर दिए गए हैं।
हाथ में सूखी मूढ़ी और छलकते आंसू, 85 साल के बुजुर्ग का छलका दर्द
किशनपुर पंचायत के भवनाथपुर निवासी 85 वर्षीय गणेश प्रसाद राय की बेबसी सरकारी संवेदनहीनता और बाढ़ की त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर पेश करती है। एनएच-80 के किनारे बांस-बल्ली के सहारे पॉलीथिन तानकर बनाए गए एक छोटे से तंबू में वे अपने मवेशियों के साथ शरण लिए हुए हैं। घर में चारों तरफ पानी भरा है और वापसी की कोई राह नहीं दिखती। दोपहर के समय जब उनसे बातचीत की गई, तो वे प्लास्टिक के बर्तन से सूखी मूढ़ी खाकर भूख मिटा रहे थे।
डूबे हुए घर की ओर इशारा करते ही बुजुर्ग गणेश राय की आंखें भर आईं और वे फफक कर रो पड़े। 85 वर्ष की ढलती उम्र में परिवार और मवेशियों संग सड़क पर तंबू में रहने की लाचारी उनके चेहरे की हर झुर्री में साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने भरे गले से अपना नाम और पता बताते हुए उम्मीद जताई कि शायद उनकी यह गुहार हुक्मरानों तक पहुंचे और तंबू तक भोजन व मवेशियों के चारे की व्यवस्था हो सके।
-1789464502928.webp)
एक ही तंबू में बच्चे, बूढ़े और मवेशी; चूल्हा जलाने की जगह नहीं
अकबरनगर के बाढ़ प्रभावित इलाकों में दर्जनों परिवारों की स्थिति गणेश राय जैसी ही नारकीय बनी हुई है। बारिश और तेज धूप से बचने के लिए तनी एक अदद पन्नी के नीचे ही छोटे बच्चे, बीमार बुजुर्ग और मवेशी एक साथ रहने को मजबूर हैं। चूल्हा जलाने के लिए न सूखी लकड़ी है और न ही राशन। सामुदायिक किचन बंद होने के बाद जिन गरीब परिवारों के पास घर का राशन पानी में बह गया, वे भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। इसके अलावा मवेशियों के लिए सूखा चारा जुटाना पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
पानी घटा तो बंद कराई व्यवस्था: सीओ
मामले पर सफाई देते हुए अंचलाधिकारी (सीओ) रमण कुमार ने बताया कि नदी के जलस्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है, इसी को ध्यान में रखते हुए सामुदायिक किचन बंद कराने का निर्णय लिया गया है और इसकी आधिकारिक रिपोर्ट जिला मुख्यालय को प्रेषित कर दी गई है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि पानी भले कुछ सेंटीमीटर उतरा हो, लेकिन मकानों में दलदल और रास्तों पर जलभराव बरकरार है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तक घर रहने लायक नहीं बनते, तब तक सड़क पर बैठे ये बेसहारा परिवार अगली थाली में भोजन का प्रबंध कहां से करेंगे?
