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एंटीजन किट में पॉजिटिव तो एलाइजा में निगेटिव क्यों? भागलपुर JLNMCH व निजी लैब की डेंगू रिपोर्ट में इतना बड़ा अंतर

Published: Mon, 14 Sep 2026 09:18 AM (IST)

भागलपुर में डेंगू जांच रिपोर्ट को लेकर असमंजस की स्थिति है, जहां निजी लैब में पॉजिटिव पाए गए मरीज JLNMCH ...और पढ़ें

Bhagalpur JLNMCH Dengue Test Report: निजी लैब में पॉजिटिव, सरकारी में निगेटिव; JLNMCH में एक हफ्ते में भर्ती सातों मरीज निकले निगेटिव

Bhagalpur JLNMCH Dengue Test Report: निजी लैब में पॉजिटिव, सरकारी में निगेटिव; JLNMCH में एक हफ्ते में भर्ती सातों मरीज निकले निगेटिव

HighLights

  1. निजी लैब में पॉजिटिव, सरकारी अस्पताल में निगेटिव आ रही रिपोर्ट।

  2. JLNMCH में 7 मरीज निजी लैब से पॉजिटिव होकर भर्ती हुए।

  3. देरी से जांच और एलाइजा टेस्ट के कारण रिपोर्ट में अंतर।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Bhagalpur JLNMCH Dengue Test Report: भागलपुर जिले में डेंगू संक्रमण की जांच को लेकर मरीजों के सामने अजीबोगरीब असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई है। निजी पैथोलॉजी लैब में जांच कराने पर जो मरीज 'डेंगू पॉजिटिव' पाए जा रहे हैं, मायागंज स्थित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (JLNMCH) के डेंगू वार्ड में भर्ती होने के बाद सरकारी जांच में उनकी रिपोर्ट 'निगेटिव' आ रही है।

बीते एक सप्ताह के भीतर अस्पताल के विशेष डेंगू वार्ड में कुल सात मरीज भर्ती कराए गए थे। इन सभी ने पहले निजी लैब में जांच कराई थी, जहां उन्हें पॉजिटिव बताया गया था। लेकिन अस्पताल पहुंचने पर जब उनकी दोबारा जांच कराई गई, तो सभी सातों मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आई। इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने स्वास्थ्य में सुधार देखते हुए उन्हें डिस्चार्ज कर दिया।

  • जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (JLNMCH), भागलपुर के डेंगू वार्ड में एक सप्ताह में भर्ती सभी 7 मरीज सरकारी जांच में मिले निगेटिव

  • निजी पैथ लैब में एंटीजन किट व सीबीसी टेस्ट में पॉजिटिव बताकर किए गए थे भर्ती; अस्पताल की एलाइजा (ELISA) जांच में रिपोर्ट आई निगेटिव

  • रिपोर्ट निगेटिव आते ही ठीक हुए मरीजों को अस्पताल से दी गई छुट्टी; सरकारी आंकड़ों में वास्तविक मरीजों के दर्ज न होने पर उठे सवाल

  • विशेषज्ञों का तर्क: निजी लैब केवल प्लेटलेट्स गिरने पर दे रहे रिपोर्ट, जबकि संक्रमण के 5-7 दिन बाद एलाइजा टेस्ट में वायरस घट जाता है

इस विरोधाभास के बाद अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर एक ही मरीज की दो अलग-अलग जगहों पर हुई जांच रिपोर्ट में इतना बड़ा अंतर क्यों आ रहा है? क्या मरीज अस्पताल पहुंचते-पहुंचते संक्रमण मुक्त हो रहे हैं या फिर सरकारी आंकड़ों में डेंगू के वास्तविक आंकड़े दर्ज ही नहीं हो पा रहे हैं?

सरकारी और निजी लैब की जांच पद्धति में बड़ा अंतर

मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रभारी डॉ. अमरेश कुमार के अनुसार, सरकारी और निजी जांच के तरीकों में बड़ा तकनीकी फर्क है:

  • निजी लैब का तरीका: अधिकांश निजी पैथ लैब में डेंगू की पहचान सामान्य 'एंटीजन रैपिड कार्ड किट' और सीबीसी (कंप्लीट ब्लड काउंट) टेस्ट से की जाती है। यदि किसी मरीज का प्लेटलेट्स काउंट कम पाया जाता है, तो कई निजी लैब तुरंत उसे डेंगू संदिग्ध या पॉजिटिव मानकर रिपोर्ट थमा देते हैं, जबकि प्लेटलेट्स में गिरावट किसी अन्य मौसमी वायरल बुखार की वजह से भी हो सकती है। सीबीसी टेस्ट डेंगू की पुष्टि करने का प्रामाणिक आधार नहीं है।

  • सरकारी अस्पताल का मानक: सरकारी स्तर पर केवल 'एलाइजा' (ELISA) टेस्ट को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन और स्वास्थ्य विभाग द्वारा सबसे प्रामाणिक व अंतिम मानक माना जाता है।

  • देरी से अस्पताल पहुंचना भी निगेटिव रिपोर्ट की बड़ी वजह

    मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजकमल चौधरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि मरीज अक्सर बीमार पड़ने के तीन-चार दिन बाद निजी लैब में जांच कराते हैं और स्थिति बिगड़ने पर पांच से सात दिन बाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचते हैं।

    डॉ. चौधरी के अनुसार, डेंगू वायरस की सक्रियता मानव शरीर में अमूमन पांच से सात दिनों तक ही चरम पर रहती है। जब मरीज देरी से अस्पताल पहुंचता है, तब तक उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (एंटीबॉडीज) बढ़ जाती है और रक्त में वायरस का लोड काफी घट जाता है। यही कारण है कि उस समय कराई गई एलाइजा जांच में वायरस पकड़ में नहीं आता और रिपोर्ट निगेटिव आ जाती है। ऐसे में एंटीजन किट और एलाइजा रिपोर्ट में अंतर आना स्वाभाविक है।

    तेज बुखार व जोड़ों में दर्द हैं डेंगू के लक्षण, समय पर कराएं जांच

    वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. हेमन्त कुमार झा ने बताया कि डेंगू होने पर मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पिछले हिस्से में दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में असहनीय दर्द, उल्टी-मतली और भूख न लगने जैसी शिकायतें होती हैं। सामान्य स्तर पर मरीज में संक्रमण के बाद भी शरीर में ऐसी एंटीबॉडी बनती है जिससे शुरुआती जांच में पुष्टि नहीं हो पाती। उन्होंने मरीजों को सलाह दी कि लक्षण दिखने के शुरुआती दो से तीन दिनों के भीतर ही सरकारी अस्पताल पहुंचकर प्रामाणिक एलाइजा जांच करानी चाहिए, ताकि समय रहते सटीक इलाज मिल सके।