भागलपुर [विकास पाण्डेय]। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भागलपुर निवासी आनंद मोहन सहाय के साथ युवावस्था से ही घनिष्ठ संबंध थे। नेताजी ने द्वितीय आजाद हिंद फौज (प्रथम आजाद हिंद फौज की स्थापना रासबिहारी बोस ने की थी) गठित कर सहायजी को उसका सेक्रेटरी जनरल बनाया था। इससे पूर्व, नजरबंदी के दौरान नेताजी आनंद मोहन सहाय के माध्यम से ही जापान समेत अन्य जगहों से अपने गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान करते थे।

सुभाष के परामर्श पर गए थे जापान : नेताजी जब कोलकाता में नजरबंद थे, तब सहायजी उनके परामर्श पर जापान गए थे। वे वहां रहकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, जावा, सुमात्रा आदि के देशभक्त भारतीयों को संगठित कर भारत की आजादी के पक्ष में जनमत तैयार करने में जुटे थे। उन्होंने जापान के आला राजनेताओं से भी अच्छे संबंध बना लिए थे। इसके लिए उन्हें समय-समय पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संपर्क करने की जरूरत पड़ती रहती थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नेताजी नजरबंद थे। इस कारण उनसे संपर्क करना मुश्किल हो जाता था।

बेटी ने साझा की जानकारी : आनंद मोहन सहाय की सुपुत्री व द्वितीय आजाद हिंद फौज की महिला टुकड़ी रानी झांसी रेजीमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट रह चुकीं आशा चौधरी बताती हैं कि नेताजी सुभाष बोस जब इलाज कराने वियेना गए थे, तब उन्होंने वहां से पापा को पत्र लिखकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की ताजी घटनाओं के संबंध में जानकारी चाही थी। वे बताती हैं कि नेताजी के कोलकाता निवास के दौरान जापान से पापा को उनके साथ संपर्क साधने में खासी सतर्कता बरतनी पड़ती थी। कोलकाता में उनकी डाक की कड़ाई से जांच की जाती थी। इस कारण उनके बीच संवादों के आदान-प्रदान विश्वस्त दूतों के जरिये होते थे।

जलयान के खलासी व डॉक्टर पहुंचाते थे संवाद : आशा बताती हैं कि जापान-भारत के बीच चलने वाले ब्रिटिश स्टीम नेविगेशन कंपनी के जहाज के दो खलासी मुर्तजा हुसैन व मुबारक हुसैन पापा के विश्वस्त दूत थे। दोनों भागलपुर के नरगा मोहल्ले के थे। पापा जापान से जरूरी संवाद व कागजात उन्हीं के मार्फत नेताजी के निकट संबंधी तक पहुंचवाते थे। ये वहां से नेताजी का संवाद लेकर पापा को देते थे। जहाज में कार्यरत बंगाली डॉक्टर एससी गुप्ता भी इसमें सहयोग करते थे।

सहायजी की पत्नी ने जब पहुंचाया संदेश : आशा के अनुसार 1934 व 1939 में दो महत्वपूर्ण अवसरों पर उनके पिता को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संपर्क करने के लिए उनकी मां सती सहाय को गुप्त कागजात के साथ भेजना पड़ा था। उनकी मां बंगाल के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी व बैरिस्टर चित्तरंजन दास की भगिनी व प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थीं। 1939 में मां को कोलकाता यात्रा पर भेजते समय उनके परिवार को मानसिक उलझनों का सामना करना पड़ा था। एक वर्ष पूर्व ही वह मायके से वापस जापान लौटी थीं। इतनी जल्दी पुन: कोलकाता जाने पर ब्रिटिश व जापानी सरकार के साथ गुप्तचरों को शक हो सकता था। उन्हें चकमा देने के लिए पापा को यह अफवाह फैलानी पड़ी थी कि पत्नी सती के साथ उनका गंभीर मतभेद हो गया है। इस कारण वे कोलकाता रहने जा रही हैं। इसके कुछ दिनों बाद मां उन्हें और उनकी छोटी बहन को लेकर कोलकाता रवाना हो गईं।

काफी महीने बाद हुई नेताजी से मुलाकात : सती सहाय करीब एक वर्ष की अथक कोशिश के बाद 1939 के दिसंबर माह में नेताजी से मिलने में सफल हो पाईं। इस काम में नेताजी की भतीजी बेला बोस ने मदद की थी। सती ने जो कागजात नेताजी को दिए, उनमें जापान एवं दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की तत्कालीन परिस्थितियों व देश की आजादी के पक्ष में वहां के छात्रों-बुद्धिजीवियों के संगठन विस्तार के बारे में जानकारी दी गई थी। जवाब में नेताजी ने आनंद को भारत व यूरोप की राजनीतिक घटनाओं का निरीक्षण करते रहने की सलाह दी थी। उनके संदेश को सती ने जहाज के डॉक्टर डॉ. गुप्ता के जरिये आनंद मोहन सहाय तक पहुंचाया था।

नेताजी के अंतर्धान होने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने खंगाल मारा सती का सामान : आशा बताती हैं कि उनकी मां सती 1941 के आरंभ में नेताजी के कुछ गुप्त संदेशों के साथ जापान लौटने की तैयारी करने लगीं। तभी 26 जनवरी, 1941 को नेताजी अदृश्य हो गए। इससे उनकी मां के जापान लौटने में भारी अड़चन पैदा हो गई थी। ब्रिटिश सरकार इस घटना से जैसे पागल हो उठी थी। जलयान पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने उनकी मां की बेडिंग, बंगाल के प्रसिद्ध रसगुल्ले तथा आम के अंचार से भरे डिब्बे तक की बारीकी से जांच-पड़ताल की थी। सती ने इससे पूर्व ही कागजात जहाज के डॉक्टर एससी गुप्ता के पास रख दिए थे।

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