भागलपुर [जेएनएन]। बांका जिले के पूर्व एसडीपीओ साविन्द्र कुमार दास (एसके दास) पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। तत्कालीन जोनल आइजी विनोद कुमार और डीआइजी विकास वैभव के रिपोर्ट पर एसडीपीओ पर विभागीय कार्रवाई शुरू करने का गृह विभाग ने आदेश जारी किया है। उन पर कई गंभीर मामलों में हेरफेर कर आरोपितों को लाभ पहुंचाने का आरोप है। मार्च 2019 में उन्होंने जो मासिक कार्य विवरणी दी थी, उसमें कुल 61 कांडों में पर्यवेक्षण किए जाने का उल्लेख किया गया। जिसमें से 28 मामलों में समीक्षात्मक टिप्पणी समर्पित नहीं की गई। ये टिप्पणी बगैर घटनास्थल का निरीक्षण किए ही कर दी गई।

वरीय अधिकारियों ने एसडीपीओ की कार्यशैली पर उठाए हैं सवाल

इनके पास बांका में रहते हुए 25 मई तक पर्यवेक्षण के लिए 203 प्रतिवेदित मामले लंबित हैं। जबकि प्रत्येक माह औसतन 120 मामले प्रतिवेदित होते हैं। उन पर हत्या के तीन, बालू चोरी के 43, सामान्य दंगा के 15, सामान्य अपहरण के 27, बलात्कार के तीन, दहेज अधिनियम के पांच, एससी, एसटी के 10, दहेज मृत्यु के दो, महिला अत्याचार के सात, शस्त्र अधिनियम के दो, रंगदारी के चार, चुनाव अधिनियम के पांच और साइबर क्राइम के चार मामले पर्यवेक्षण के लिए लंबित पड़े थे। वरीय अधिकारियों के समीक्षा में एसडीपीओ के पर्यवेक्षण में काफी त्रुटि पाई गई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने हत्या, लूट, डकैती, आम्र्स एक्ट, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के 17 मामलों के पर्यवेक्षण में विलंब करते हुए त्वरित कार्रवाई नहीं की गई। जिससे अधिकारियों ने उनकी कार्यशैली पर कई सवाल उठाए हैं।

पांच गंभीर कांड, जिसमें पाई गई अनियमितता

1. बौंसी में हत्या के एक मामले में इनके द्वारा दुर्घटना बताते हुए एक व्यक्ति पर आरोप सत्य पाते हुए पर्यवेक्षण टिप्पणी दी गई। लेकिन इस मामले में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बांका ने पुन: जांच का आदेश दिया था। आदेश के बाद बांका एसपी ने मामले का पर्यवेक्षण किया। जिसमें उन्होंने इस मामले को हत्या की धाराओं में परिवर्तित किया। जो सत्या पाया गया।

2. धोरैया में मारपीट के एक मामले को उन्होंने जख्म प्रतिवेदन रहते हुए भी झूठा करार देते हुए पर्यवेक्षण कर दिया। लेकिन जब डीआइजी विकास वैभव के निर्देश बांका एसपी ने इसकी समीक्षा की तो मारपीट की धाराओं में केस सभी नामजद आरोपितों के विरूद्ध सत्य पाया गया।

3. धोरैया में नाबालिग लड़की के अपहरण से संबंधित मामले में पर्यवेक्षण के दौरान बयान में बलात्कार की बात कहने के बावजूद संबंधित धारा को नहीं जोड़ा गया। बल्कि सिर्फ पॉक्सो एक्ट के तहत कांड को सत्य पाया गया। जब बांका एसपी ने अपना रिपोर्ट टू निकाला तो उसमें बलात्कार की धाराएं जोडऩे का उल्लेख किया गया।

4. धौरैया के एक मामले में एसडीपीओ ने अपने पर्यवेक्षण टिप्पणी में असंज्ञेय पाया। जबकि बांका एसपी ने अपनी रिपोर्ट टू में इस त्रुटि पर टिप्पणी करते हुए इस कांड को गंभीर धाराओं में सात नामजद अभियुक्तों पर सत्य पाया।

5. धौरैया के एक डकैती के मामलों में उन्होंने लूट की धाराओं में सत्य करार दिया। जबकि इस घटना को पांच अपराधियों ने मिलकर अंजाम दिया था। इस कारण इसे डकैती की धराओं में केस को सत्य करार देना चाहिए। बांका एसपी ने अपने रिपोर्ट टू में इस त्रुटि का उल्लेख करते हुए निराकरण किया गया।

Posted By: Dilip Shukla

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